नरेन्द्र सिंह परिहार
यौवन की कस्तूरी ने दे दी तेरी गंध।
मन पागल हुआ बोला, पीने दे मकरंद॥
ऐसी सुरभि को बिखरा, जाओ न तनिक दूर।
पर आलिंगन लालसा, करो न चकनाचूर॥
बाब कट इन केशों से, दमका तेरा रूप।
मैं तेरी छाया बनूं, तू मेरी धूप॥
तनखाह ने बदल दिया, गोरी का व्यवहार।
गिरगिट के रंग दिखला, बदले आज विचार॥
सूखेंगे ये आंसू भी, गालों से हो दूर।
लौटेगा फिर प्यार यूं, लख अधर अंगूर॥
पाने की लालसा में, है शर्तों की होड़।
आधुनिकता लिबास उतार, खो गई दौलत, दौड़॥
हेलमेल किससे रहे, एकांत तू ही बोल।
घपलों के चरित्र में सब, अब पोल तू न खोल॥