- आलोक प्रकाश पुतुल
हबीब तनवीर अब जब नहीं हैं तो उनके बारे में कई बातें याद आ रही हैं। रायपुर वाले घर में खाने की मेज के पास बैठ कर सिगार फूंकते हुए या रिहर्सल के दौरान किसी के खराब अभिनय पर अफसोस करते हुए या बातचीत करते समय सवालों को तौलने वाले अंदाज में चश्मे के पीछे से देखते हुए... दिल्ली-6 देखते हुए जब 'सास गारी देवे' के शब्द कान में पड़े तो मुंह से निकल गया- हबीब तनवीर, लगा कि इस बार हबीब साहब अपने घर आएंगे तो उनसे लंबी बातचीत की जाए।
उनके जल्दी ही रायपुर आने की खबर मिली। लेकिन वे रायपुर नहीं आ पाए। खबर आई कि अस्पताल में भर्ती हैं। फिर एक दिन सुबह-सुबह उनके देहावसान की खबर... फिल्म ब्लैक एंड व्हाईट के वे दृश्य आंखों के सामने आ गये, जिसमें हबीब साहब सफेद कफन में लेटे हुए थे। तो क्या यह जिन्दगी के नाटक का रिहर्सल था?
...रंगमंच पर शाइर नासिर काजमी की गाल गाते हुए हबीब तनवीर याद आ रहे हैं- ''गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया, किधर गया वो, अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो...'' यहां पेश है, हबीब तनवीर से की गई एक पुरानी बातचीत के अंश।
? बाजार का दबाव व प्रभाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसमें आप रंगमंच के स्थान को कहां निर्धारित करते हैं?
बाजार का जो दबाव बढ़ा है, आपका मतलब फ्री मार्केट से है; उसका नतीजा है सेटेलाइट टेलीविजन, इंटरनेशनल पैकेज, इनसे कटा हुआ,दूर का विदेशी, गलत कल्चर। उसका प्रहार हमारी संस्कृति पर है और हमारे सारे संस्कार पर है, इसी का शिकार थिएटर भी है। बस मैं यही देखता हूं।
सरकार को जो भ्रम है कि हम इस देश की 'कल्चर' की सुरक्षा कर रहे हैं, वो महज एक ढकोसला बन कर रह जाता है। 'कल्चर' की सुरक्षा के लिए उनको बाजार का भी ख्याल रखना पड़ता है। मंत्रालय के जो काम हैं सूचना-प्रकाशन विभाग हो, संस्कृति हो, कामर्स हो या फॉरेन अफेयर्स हो, सब जगह इनको समझौता करना पड़ेगा। कोई भी चीज ऐसी नहीं है, जिसका 'कल्चर' पर प्रभाव नहीं पड़ता। 'कल्चर' एक ही है, जो सब में 'प्रोवेट' करती है। लेकिन 'कल्चर' ही ऐसी चीज है, जिसके ऊपर किसी भी सरकार ने आज तक ध्यान नहीं दिया। सिवाय एक ग्रांट देने, अनुदान देने के। तो इससे 'कल्चर' की सुरक्षा नहीं होती। 'कल्चर' की सुरक्षा का मतलब बिल्कुल एक ऐसे विकास का तरीका है, जिसमें बड़ी टेक्नालॉजी, बड़ी फैक्ट्रियों के साथ-साथ ग्रामीण विकास, आदिवासी विकास, इनको शामिल किया जाए। इनकी समस्याओं का समाधान क्या है, ये जान कर जो विकास होगा, वह बेहतर होगा। कोई जरूरी नहीं है कि गांव का कोई आदमी भाग-भाग कर शहर आए। कोई जरूरी नहीं है कि ऐसी शिक्षा हो, जिसको हासिल करके आदमी बाबू बने और बाबू न बने, चपरासी बने और वो भी न बने, झुग्गियों में जाकर फसाद करे। शिक्षा का ये नतीजा हुआ है।
शिक्षा के अन्दर भी जो बुनियादी गड़बड़ियां हैं तो उसके अंदर भी सोचना पड़ेगा। शिक्षा का कौन-सा तरीका अच्छा होगा, ये गौर से सोचना होगा। हालांकि कोई भी शिक्षा बुरी नहीं होती लेकिन वो कौन-सी शिक्षा हो जो सबके लिए कनवेनिएंट हो, यह विचार किया जाना चाहिए।
तो आपने एक सवाल किया और उसके जो सारे आस्पेक्ट हैं शिक्षा, विकास आदि-आदि, ये सब बाजार के शिकार हुए हैं।
ऐसे समय में जब बुनियादी रास्ते में ही भटकाव हो तो आपको लगता है कि रंगमंच 'सरवाइव' कर पाएगा?
रंगमंच 'सरवाइव' कर पाएगा, अगर हम 'सरवाइव' कर पाएंगे। मेरा ख्याल है कि जनजीवन में रंगमंच से जुड़े लोगों का जो जीवटपन है कल्चरली, वो थोड़ा खास किस्म का है। थिएटर में आदमी आता है चला जाता है लेकिन वो अपने आपको सचेत करके रखे, उनकी क्रिएटिविटी बची रही तो सब ठीक हो जाएगा। हालांकि नुकसान बहुत हो चुका है, हो रहा है, लेकिन मुझे यकीन है क्योंकि बहुत से नौजवान लगे हुए हैं थिएटर की बेहतरी के लिए, उसकी सच्ची पहचान कायम करने के लिए। ऐसा नहीं हुआ कि टेलीविलन आया या ंफिल्म आई तो थिएटर खत्म हो गया।
? लेकिन टेलीविजन और फिल्म के लिए ही थिएटर को लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, ऐसा नहीं लगता?
कुछ लोग कर रहे हैं। वह भी इसीलिए क्योंकि टेलीविान-ंफिल्मों ने हमला बोला है। वैसे ये सवाल उनसे ही पूछा जाना चाहिए।
? बाजार के हमले के अलावा एक दूसरा हमला असंगत रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी बोला जाता रहा है। जो इधर के दिनों में तेजी से बढ़ा है। आप क्या सोचते हैं?
जैसे?
? उदाहरण के लिए 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोए' नाटक को ही ले लें। इस नाटक के पक्ष-विपक्ष में खूब हंगामा हुआ। आप क्या सोचते हैं?
अगर आप सिर्फ 'नाथूराम...' वाले प्ले के बारे में पूछ रहे हैं तो उसका जवाब अलग है और बाकी जवाब अलग है।
? पहले 'नाथूराम...' पर ही बात करें।
'नाथूराम...' जैसा कि अंखबारों में मुझे रपटें मिली मेरी अपनी जाति राय यही है कि बैन सही था। इसीलिए क्योंकि एक लेखक को इसका तो हक है कि वो किसी को भी क्रिटिसाइज करे। चाहे वो गांधी जी हों या नेहरू जी हों या कोई भी हो। लेकिन इसका हक किसी को नहीं है कि वो स्थिति को, फैक्ट्स को डिस्ट्राय करके यह काम करे।
हमें जो अंखबारों से रिपोटर्ें मिली हैं, हमने स्क्रिप्ट नहीं पढ़ा, हमने ड्रामा नहीं देखा, हो सकता है गलत हो। अखबारों में जो पढ़ा उससे पता चलता है कि गांधी जी जो थे, वो पाकिस्तान के फेवर में थे और गोडसे जो थे वे इसके खिलांफ थे- ये बंकवास है।
गांधी जी... जब यह सब कुछ हो रहा था, हम भी होश में थे, बच्चे नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि बंटवारा मेरी लाश पर होगा। अगर ये कहना चाहते हैं कि यह कहने के बावजूद उन्होंने पटेल को नहीं रोका तो यह हो सकता है। क्रिटिकल पॉलिटिक्स हो सकता है। मगर ये कहना गलत है कि गांधी पक्ष में थे और गोडसे इसके खिलांफ थे। ये बात सभी जानते हैं कि वो लोग गोडसे को हीरो बनाने की कोशिश कर रहे हैं। गोडसे हीवो-वीरो कुछ नहीं था, एक कातिल था। जिसने एक ऐसे आदमी की हत्या की, जिसने सारे हिंदुस्तान में घूम-घूम कर हिंदू-मुस्लिम फसाद को रोकने के लिए, पार्टिशन को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी। ये और बात है कि उनकी बात तब किसी ने सुनी नहीं।