क्या है साहित्य का उद्देश्य

मक्सिम गोर्की
अनुवाद -नरोत्तम नागर

शायद मेरी बात से तुम सहमत होगे, अगर मैं कहूँ कि साहित्य का उद्देश्य है - खुद अपने को जानने में इंसान की मदद करना, उसके आत्मविश्वास को दृढ बनाना और उसकी सच की खोज को सहारा देना, लोगों की अच्छाइयों का उद्धाटन करना और बुराइयों का उन्मूलन करना, लोगों के हृदय में हयादारी, गुस्सा और साहस पैदा करना, ऊँचे उद्देश्यों के लिए शक्ति बटोरने में उनकी मदद करना और सौंदर्य की पवित्र भावना से उनके जीवन को शुभ्र बनाना। तो यह है मेरी व्याख्या।

जाहिर है कि यह व्याख्या एक खाका भर है और अधूरी है। तुम इसमें जीवन को परिष्कृत करने वाली दूसरी चीजें भी जोड़ सकते हो। लेकिन मुझे यह बताओ - क्या तुम इसे मानते हो?

एक समय था जब, यह धरती लेखनकला-विशारदों, जीवन और मानव-हृदय के अध्येताओं और ऐसे लोगों से आबाद थी, जो दुनिया को अच्छा बनाने की सर्वप्रबल आकांक्षा और मानव-प्रकृति में गहरे विश्वास से अनुप्राणित थे। उन्होंने पुस्तकें लिखीं, जो कभी विस्मृति के गर्भ में विलीन नहीं होंगी, क्योंकि वे अमर सच्चाइयों को अंकित करती हैं और उनके पन्नों से कभी न मलिन होने वाला सौंदर्य प्रस्फुटित होता है।

उनमें चित्रित पात्र जीवन के सच्चे पात्र हैं, क्योंकि प्रेरणा ने उनमें जान फूँकी है। इन पुस्तकों में साहस है, दहकता हुआ गुस्सा है और उन्मुक्त तथा सच्चा प्रेम है। उनमें एक भी शब्द भर्ती का नहीं है। तुमने, मैं जानता हूँ, ऐसी ही पुस्तकों से अपनी आत्मा के लिए पोषण ग्रहण किया है। फिर भी तुम्हारी आत्मा उसे पचा नहीं सकी। इसलिए सत्य और प्रेम के बारे में तुम जो लिखते हो, वह झूठा और अनुभूतिशून्य प्रतीत होता है। लगता है, जैसे शब्द जबर्दस्ती मुँह से निकाले जा रहे हों। चाँद की तरह तुम दूसरे की रोशनी से चमकते हो, और यह रोशनी भी बुरी तरह मलिन है - वह परछाइयाँ तो खूब डालती हैं, लेकिन आलोक कम देती हैं, और गर्मी तो उसमें जरा भी नहीं है। तुम खुद इतने गरीब हो कि दूसरों को ऐसी कोई चीज नहीं दे सकते, जो वस्तुत: मूल्यवान हो। और जब तुम देते भी हो, तो सर्वोच्च संतोष की इस सजग अनुभूति के साथ नहीं कि तुमने सुंदर विचारों और शब्दों की निधि में वृध्दि करके जीवन के सांयोगिक सत्य को अत्यंत आवश्यक घटना मानकर उसे ऊँचे सिंहासन पर बैठाने के लिए। तुम केवल इसलिए देते हो कि जीवन और लोगों से अधिकाधिक ले सकते। तुम इतने गरीब हो कि उपहार नहीं दे सकते। तुम सूदखोर हो और अनुभव के टुकड़ों का लेन-देन करते हो, ताकि तुम ख्याति के रूप में सूद बटोर सको। तुम्हारी लेखनी चीजों की सतह को ही खरोंचती है। जीवन की तुच्छ परिस्थितियों को तुम बेकार ही कुरेदते-कोंचते हो। और चूँकि तुम साधारण लोगों के साधारण भावों का वर्णन करते हो, इसलिए हो सकता है कि तुम उन्हें अनेक साधारण-महत्वहीन-सच्चाइयाँ सिखाते हो। लेकिन क्या तुम, नाम मात्र को ही सही, ऐसे भरम की भी रचना कर सकते हो, जो मानव की आत्मा को ऊँचा उठाने की क्षमता रखता हो? नहीं, तो क्या तुम सचमुच इस बात को इतना महत्वपूर्ण समझते हो कि सभी जगह छितरे पड़े कूड़े के ढेरों को कुरेदा जाये, जहाँ सत्य के काले टुकड़ों के सिवा और कुछ नहीं मिलता, और सिध्द किया जाये कि इंसान बुरा, मूर्ख और सम्मान की भावना से बेखबर है? या यह कि वह पूर्णतया और हमेशा के लिए बाह्य परिस्थितियों का गुलाम है और यह कि वह कमजोर, दयनीय और एकदम अकेला है? अगर तुम मुझसे पूछो, तो वे इंसान के दिल में यह विश्वास जमाने में सफल भी चुके हैं कि वास्तव में ऐसा ही है। तुम्हीं देखो कि इंसान का दिमाग आज कितना ठस हो गया है और उसकी आत्मा के तार कितने बेआवाज हो गए हैं। यह कोई अचरज की बात नहीं है। वह अपने-आपको उसी रूप में देखता है, जैसा कि वह पुस्तकों में पेश किया जाता है... और पुस्तकें खास तौर से प्रतिभा का भ्रम पैदा करने वाली वाक्-चपलता से लिखी हुई पुस्तकें पाठकों को हतबुध्दि कर एक हद तक उन्हें अपने वश में कर लेती हैं। पुस्तक में अपने को देखते समय - जैसा कि तुम उसे पेश करते हो - उसे अपना भौंडापन तो नजर आता है, लेकिन यह नजर नहीं आता कि उसके सुधार की भी कोई संभावना हो सकती है। क्या तुम में इस संभावना को उभार कर सामने लाने की क्षमता है? लेकिन यह तुम कैसे कर सकते हो, जबकि खुद तुम... जाने दो,मैं तुम्हारी भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाऊँगा, क्योंकि मेरी बात को काटने या अपने-आपको सही ठहराने की कोशिश किए बिना तुम मेरी बात सुन रहे हो। यह अच्छा भी है, क्योंकि एक शिक्षक में अगर ईमानदारी है, तो वह हमेशा एक अच्छा -ध्यान से सुनने वाला - छात्र होगा। आजकल तुम सब शिक्षक, लोगों को सीख देने वाले लोग, जनता को उतना देते नहीं, जितना उससे लेते हो। कारण कि तुम केवल उनकी कमजोरियों का ही जिक्र करते हो। कमजोरियों के सिवा और कुछ उनमें नहीं देखते। लेकिन निश्चय ही आदमी में गुण भी होते हैं। खुद तुममें नहीं हैं क्या? तुम? सच पूछो, तो क्या तुम खुद उन बेरंग लोगों से किसी मानी में भिन्न हो, जिनका तुम इतना कुरेद-कुरेद कर और इतनी निर्ममता से चित्रण करते हो? तुम अपने-आपको मसीहा के रूप में देखते हो। समझते हो कि ईश्वर ने तुम्हें इस दुनिया में भेजा है, ताकि अच्छाइयों की विजय हो। लेकिन बुराइयों को अच्छाइयों से छाँटते समय क्या तुमने यह नहीं देखा कि ये दोनों चीजें काले और सफेद धागों की तरह एक-दूसरे से उलझी हुई हैं? और चूँकि वे उलझी हुई हैं, इसलिए काली और सफेद न रहकर धूसर बन गई हैं। दोनों ने एक-दूसरे के रंग पर अपना असर डाला है। अगर ऐसा होता, तो इसके लिए वह तुमसे कहीं ज्यादा मजबूत इंसानों को चुनता। उनके हृदयों में जीवन, सद्य और लोगों के प्रति गहरे प्रेम की जोत जगाता, ताकि वे अंधकार में उसके गौरव और शक्ति का उद्धोष करने वाली मशालों की तरह आलोक फैलायें। तुम लोग तो शैतान की मोहर दागने वाली छड़ की तरह धुऑं लोगों के दिलों और दिमागों में सरसराता हुआ उन्हें आत्मविश्वासहीनता के भावों से भर देता है। मुझे यह बताओ, तुम क्या सीख देते हो?

इसीलिए तुमने और तुम्हारी जाति के अन्य लोगों ने जो कुछ भी लिखा है, उस सबका एक सचेत पाठक, मैं तुमसे पूछता हूँ - तुम क्यों लिखते हो? संयोगवश तुमने काफी लिखा है। क्या इसलिए कि लोगों के हृदयों में अच्छी भावनाएँ जाग्रत हों? लेकिन अपने ठंडे और थोथे शब्दों से तुम कभी ऐसा नहीं कर सकोगे। केवल इतना ही नहीं कि तुम जीवन में कोई नयी वृध्दि करने में असमर्थ हो, बल्कि पुराने को भी तुम इतनी मुड़ी-तुड़ी शक्ल में पेश करते हो कि सुस्पष्ट चित्र कहीं उभर कर नहीं आते। तुम्हारी कृतियाँ कुछ नहीं सिखातीं और पाठक सिवा तुम्हारे और किसी चीज पर शर्म महसूस नहीं करता। तुम्हारी कृतियों की हर चीज आम-साधारण है - आम-साधारण लोग, आम-साधारण विचार, आम-साधारण घटनाएँ। आत्मा के विद्रोह और आत्मा के पुनर्जागरण की आवश्यकता के बारे में लोग कब बोलना शुरू करेंगे? रचनात्मक जीवन की वह ललकार कहीं है, वीरता के दृष्टांत और प्रोत्साहन के वे शब्द कहाँ हैं, जिन्हें सुनकर आत्मा आकाश की ऊँचाइयों को छूती है?

शायद तुम कहो - जो कुछ हम पेश करते हैं, उसके सिवा जीवन में अन्य नमूने मिलते कहाँ हैं? न, ऐसी बात मुँह से न निकालना। यह लाा और अपमान की बात है कि वह, जिसे भगवान ने लिखने की शक्ति प्रदान की है, जीवन के सम्मुख अपनी पंगुता और उससे ऊपर उठने में अपनी असमर्थता को स्वीकार करे। अगर तुम्हारा स्तर भी वही है, जो जीवन का, अगर तुम्हारी कल्पना ऐसे नमूनों की रचना नहीं कर सकती, जो जीवन में मौजूद न रहते हुए भी उसे सुधारने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, तब तुम्हारा कृतित्व किस मर्ज की दवा है? और तुम्हारे धंधे की क्या सार्थकता रह जाती है? लोगों के दिमागों को उनके घटनाविहीन जीवन के फोटोग्रफिक चित्रों का गोदाम बनाते समय अपने दलि पर हाथ रखकर पूछो कि ऐसा करके क्या तुम नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो? कारण - और तुम्हें अब यह तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए - कि तुम जीवन का ऐसा चित्र पेश करने का ढंग नहीं जानते, जो लाा की एक प्रतिशोधपूर्ण चेतना को जन्म दे, जीवन के नये रूपों की रचना करने की प्रवलित आकांक्षा को उजागर करे। क्या तुम जीवन की नब्ज को तेज और उसमें स्फूर्ति का संचार करना जानते हो, जैसा कि अन्य लोग कर चुके हैं?
एक बात और। क्या तुम ऐसे आह्लादपूर्ण हास्य की रचना कर सकते हो, जो आत्मा का सारा मैल धो डाले? देखो न, लोग एकदम भूल गए हैं कि ठीक ढंग से कैसे हँसा जाता है। वे कुत्सा से हँसते हैं, वे कमीनेपन से हँसते हैं, वे अक्सर अपने ऑंसुओं को बेधकर हँसते हैं। वे हृदय के उस समूचे उल्लास से कभी नहीं हँसते, जिससे वयस्कों के पेट में बल पड़ जाते हैं और पसलियाँ बोलने लगती हैं। अच्छी हँसी एक स्वास्थप्रद चीज है। यह अत्यंत आवश्यक है कि लोग हँसें। आखिर हँसने की क्षमता उन गिनी-चुनी चीजों में से एक है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती हैं। यह समझने की कोशिश करो कि सीख देने का तुम्हारा अधिकार उन सच्चे भावों को जाग्रत करने की तुम्हारी क्षमता पर निर्भर करता है, जो - हथौड़े की चोटों की तरह -जीवन को सीमित करने वाले पुराने रूपों को चकनाचूर और नष्ट कर दें, ताकि अधिक प्रशस्त रूपों का निर्माण किया जा सके। गुस्सा, घृणा, साहस, लाा, चिढ़ और, सबसे अंत में, विक्षुब्ध निराशा - ये ऐसे अस्त्र हैं, जिनके द्वारा इस धरती पर कोई भी चीज नष्ट की जा सकती है। क्या तुम ऐसे अस्त्रों की रचना कर सकते हो? क्या तुम उनसे काम लेना जानते हो? तुम्हें अपने हृदय में मनुष्य की कमजोरियों के लिए महान घृणा का या साधारण मनुष्य के लिए महान प्रेम का - उसके दुखों की आग में जनमें प्रेम का - पोषण करना चाहिए। तभी तुम लोगों को संबोधित करने के अधिकारी बन सकोगे। अगर तुम इन दोनों में से न इसका अनुभव करते हो और न उसका, तो सिर नीचा रखो और कुछ कहने से पहले सौ बार सोचो।

सब कुछ के बावजूद जीवन पहले से अधिक प्रशस्त और अधिक गहरा होता जा रहा है, लेकिन यह बढ़त धीमी गति से हो रही है। कारण कि इस गति को तेज बनाने योग्य न तो तुम्हारे पास शक्ति है, न ज्ञान है। जीव बढ़ रहा है और लोग दिन-प्रतिदिन अधिक और अधिक जानना चाहते हैं। अधिक और अधिक पूछताछ करना चाहते हैं। उनके सवालों के जवाब कौन दे? यह तुम्हारा काम है - तुम्हारे जैसे लोगों का, जो अपने-आप मसीहा बन बैठे हैं। लेकिन क्या तुम जीवन में इतने गहरे पैठे हो कि उसे दूसरों के सामने खोल कर रख सको? क्या तुम जानते हो कि समय की माँग क्या है? क्या तुम्हें भविष्य की जानकारी है और क्या तुम अपने शब्दों से उस आदमी में नयी जान फूँक सकते हो, जिसे जीवन की नीचता ने भ्रष्ट और निराश कर दिया है? उसका हृदय पस्त है, जीवन की कोई उमंग उसमें नहीं है। भला जीवन बिताने की आकांक्षा तक को उसने विदा कर दिया है और अब वह सिर्फ सूअर की तरह जीवन बिताना चाहता है। ह्रासग्रस्त वह हड्डियों का एक पुंज बन गया है, जो मांस और मोटी चमड़ी से ढँका है। और हड्डियों का वह पुंज आत्मा से नहीं, बल्कि लालसा से - वासना से - हिलता-डुलता है। उसे तुम्हारी बेहद जरूरत है। जल्दी करो और इससे पहले कि उसका मानवीय रूप अंतिम रूप से उससे विदा हो जाये, उसे जीने का ढंग बताओ। लेकिन तुम किस प्रकार उसमें जीवन की वह चाह जगा सकते हो, जबकि तुम खुद बुदबुदाने और भुनभुनाने और रोने-झींकने या उसके पतन की एक निष्क्रिय तस्वीर खींचने के सिवा और कुछ नहीं करते? ह्रास की गंध धरती को घेरे है, लोगों के हृदयों में कायरता और दासता समा गयी है, काहिली की नरम जंजीरों ने उनके दिमागों और हाथों को जकड़ लिया है। इस घिनौने जंजाल को तोड़ने के लिए तुम क्या करते हो? तुम कितने छिछले और कितने नगण्य हो, और कितनी बड़ी संख्या है तुम जैसे लोगों की। काश कि एक भी ऐसी आत्मा का ऊदय हुआ होता - कठोर और प्रेम में पगी आत्मा का उदय - जो मशाल की तरह प्रकाश देने वाले हृदय और सर्वव्यापी महान मस्तिष्क से सज्जित होती। तब भविष्यवणी शब्द घंटे की ध्वनि की भांति इस शर्मनाक खामोशी में गूँज उठते और शायद इन जीवित मुर्दों की घिनौनी आत्माओं में भी कुछ स्पंदन पैदा हो जाता...।