गीत

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

क्यों हो गया समय विद्रोही,
क्यों साध सब पंगु हो गए,
मानव की मानव से - शायद-
मानवता पर ही अनबन है।
रिक्त हुई इच्छायें सारी,
या फिर है अपनी लाचारी,
कोई रहा नहीं व्यवहारी।
द्वेष, कपट, छल, छीनाझपटी,
निर्मोही, अभिमानी, कपटी।
परनिंदा, अनीति, अनचाही,
विप्लव, बाधा, ध्वंस तबाही।
बड़ा आभागा प्रजातंत्र है
अंकित, अपराधी, गठबंधन है।
मानवता पर ही अनबन है।

समझौते, सिध्दांत, सलाहें,
अपनापन कब कहाँ सराहें,
अंतस अशुभ, अमानी राहें।
आजादी की - प्रौढ़ावस्था,
उस पर यह लाचारव्यवस्था,
विधि बाहुल्य अनैतिक कर्म
क्लिष्ट, कुमार्गी राष्ट्रीय धर्म।
टूटी जनास्था, विवेक क्यों ?
भयाक्रांत हर अभिनन्दन है।
मानवता पर ही अनबन है।

शीर्षक शून्य कहानी अनगढ,
थकीं पीढ़ियां अब तक पढ़-पढ़,
कुछ खोयाकुछ पाया लड़-लड़,
हर उपक्रम उदास अनमन है,
टूटी रूठी लाग-लगन है,
देखें क्या भविष्य के सपने,
अपनों से अब लुटते अपने,
सत्य, शपथ निर्धन का धन है।
मानवता पर ही अनबन है।