प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर से महावीर अग्रवाल की बातचीत
रंगमंच हमारी, और राजनैतिक गतिविधियों का हिस्सा बन पाया है या नहीं ? हिन्दी रंगमंच को जीवंत और गतिशील बनाने में आप अपने समकालीन रंगकर्मियों से क्या अपेक्षा रखते हैं ?
रंगमंच हमारी गतिविधियों का हिस्सा नहीं बन पाया है। लेकिन बिल्कुल नहीं बन पाया है, ऐसा भी नहीं है। सामाजिक दृष्टि से कुछ नौजवान काम कर रहे हैं। आर्थिक समस्या के कारण रंगकर्मी फिल्म और टेलीविजन की ओर चले जाते हैं। इसके पीछे उनकी ललक और मजबूरी दोनों छिपी हुई है।
अभिनेता, निर्देशक, गायक, मेकअप मैन और संगीत से जुड़े कलाकार, रंगमंच के आप-पास जितने भी लोग हैं, आर्थिक दृष्टि से सभी रंगकर्मियों की हालत खराब है। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। कुछ रंग ग्रुपों को अनुदान जरूर मिलता है, बाकी की कोई पूछ-परख नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि राजनीतिज्ञ संस्कृति को नहीं समझते हैं। चुनांचे उनकी कोई दृष्टि नहीं है। राजनैतिक गतिविधियों में भी संस्कृति का दखल नहीं है।
थियेटर की सेवा कुछ लोग आज भी कर रहे हैं। गाँवों में भी और शहरों में भी अपनी-अपनी सीमाओं से सब काम कर रहे हैं। समग्र रूप से देखने पर मुझे समूचे रंग जगत में मूल्यनिष्ठ रंगमंच की कमी खटकती है। अर्थ की छटा अर्थात् रिस्पांस अलग तरह से होना चाहिए। सृजनात्मक हस्तक्षेप बहुत जरूरी है। विपरीत स्थितियों में भी मुझे रंगकर्म की शक्ति पर बहुत भरोसा है।
आज दूरदर्शन, फिल्म और वीडियो की ओर जनमानस तीव्र गति से आकर्षित होता जा रहा है। इस स्थिति में रंगमंच, नुक्कड़ नाटक और नाटय के प्रति जनता फिर से अधिक रुचि लेइस दिशा में कौन-से प्रयत्न किए जा सकते हैं ?
यह सवाल खुद अपनी जगह पर गलत है। फिजूल सवाल है। मेरे सामने हमेशा गलत ढंग से आता है। लच्छेदार भाषणों और आभिजात्य गोष्ठियों के ब पर आप जनता को प्रभावित नहीं कर सकते। फिल्म और टी.वी. ने समय और समाज को बहुत बदला है। लेकिन यह मीडिया पूरी तरह रंगमंच का विरोधी या प्रतिस्पर्धा नहीं है। एक सोच, एक दृष्टि, एक विजन के साथ काम करें तो दोनों एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। टेलीविजन में आधे से अधिक कलाकार थियेटर से निकलकर पहुँचते हैं। थियेटर, फिल्म और टी.वी. अलग-अलग माध्यम हैं। फिर भी आप देखिए, अभिनेता और अभिनेत्री तीनों माध्यमों में बहुत महत्वपूर्ण रंगकर्मी को जब रंगमंच पर वांछित शोहरत नहीं मिलती तो वह दूरदर्शन और फिल्म के माध्यम से अपने सपने पूरे करने की कोशिश करता है।
लेकिन यह थियेटर का विकास नहीं है। आधे घंटे के सीरियल में पन्द्रह मिनट का विज्ञापन भी विकास नहीं है। यदि जनता को जाग्रत करना है तो विकास का बेढंगापन ठीक करना जरूरी है। हमारी जड़ी-बूटी, हमारी गाँव की परम्परा, हमारा लिबास, खाना-पहनावा, हमारे गीत, हमारी खेती किसानी और हमारी बोली, हमारी रस्मेंये सब संस्कार हैं। लोक के बीच हमारी संस्कृति है। इन सबको नजरअंदाज करके विकास का पहलू पैदा करना गलत होगा।
विकास का अर्थ बड़ी बिल्डिंग नहीं हैजनभागिता है। पंचायतराज के नाम पर ढोल बहुत पीटा गया है। मैं पूछता हूँ वास्तविक अधिकार आज भी किनके हाथ में है ? प्रदूषण का हमारे पास क्या इलाज है ? हजारों प्रश्न हैं, जिनका संबंध जन-जन के विकास से है। उनका कोई उत्तर राजनीतिज्ञों के पास नहीं है। अपसंस्कृति को कितना ही बढ़ावा दिया जाए, टी.वी और मीडिया कभी भी थियेटर का स्थानापन्न नहीं हो सकते। थियेटर का जादू कुछ अलग किस्म का होता है। भीतरी कशिश दर्शक को रंगमंच की ओर चुंबक की तरह खींचती है। पिछले तीस वर्षों का मेरा अपना अनुभव है कि हर शहर में दर्शकदीर्घा खचाखच भरी रहती है। चुनांचे अपनी संस्कृति को, अपने थियेटर को बाजार से बचाइए। अपनी जमीन की महक ही अलग होती है।
कम साधनों द्वारा नाटक करने की शैली 'नुक्कड़ नाटक' की लोकप्रियता हिन्दी रंगमंच के लिए कहाँ तक उपयोगी है ? क्या नुक्कड़ नाटक को आधुनिक लोकनाटय माना जा सकता है ? समकालीन विसंगतियों और विद्रूपताओं को अभिव्यक्ति देने में अभिजात रंगशाला के नाटक अधिक सफल हैं या नुक्कड़ नाटक ?
नुक्कड़ नाटक की मूल ताकत यह है कि दर्शक नाटक से तत्काल और सीधे जुड़ जाता है। चुनांचे इसकी छवि और प्रभाव ध्वन्यात्मक होता है। दर्शक के जेहन में सवाल उठता है ? अब क्या होगा ? जनता की तात्कालिक समस्याों को उठाना चुनौतीपूर्ण काम है। आम नागरिक अपनी सोच से, अपनी कठिनाई से सीधे सड़क पर साक्षात्कार करते हैं। इसलिए गोल घेरे के चारों ओर दर्शक जुटते चले जाते हैं। जनशक्ति में गहरी आस्था का चिंतन इन्हें आगे बढ़ाता है। नुक्कड़ नाटक के विकास का रास्ता जन आन्दोलन के बीच से ही निकलेगा। समकालीन विसंगतियों को अभिव्यक्ति देने में रंगशाला और नुक्कड़ दोनों ही स्थानों के नाटक सफल होते हैं। चुनांचे अपनी-अपनी जगह दोनों महत्वपूर्ण हैं। किसी भी नाटक की सफलता के लिए उसमें अपनी संस्कृति की छाप, अपनी जमीन की खुशबू का होना बहुत जरूरी है।
भारतीय नाटय परंपरा को आगे बढ़ाने में 'इप्टा' की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में कुछ बताइए। क्या आप आज या पहले कभी 'इप्टा' से जुड़े रहे हैं ?
'इप्टा' की ऐतिहासिक भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। 'इप्टा' के नाटकों ने आर्थिक और सामाजिक स्थिति से रूबरू कराया। हमें हमारी संस्कृति के साथ जोड़ा। राजनीति के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया। आजादी की लड़ाई में पूरे देश में जन आन्दोलन का कार्य 'इप्टा' ने ही किया। 1946 में मैं मुम्बई पहुँचा। फिल्मों में अभिनय किया, नज्में लिखीं, स्वतन्त्रता के लिए कविताएँ लिखीं। 'इप्टा' के बैनर पर लगातार गीत गाए। 'अरे अब भागो लंदन जाओ' जैसे गाने हम गाते थे। उस समय साहिर, कैफी आामी और शैलेन्द्र की कविताओं की धूम रहती थी। मैं 'इप्टा' में 1948 से बहुत सक्रिय हो गया था।
1948 में ही इलाहाबाद में 'इप्टा' का एक सम्मेलन हुआ। मुंबई इप्टा के महासचिव रामाराव, बलराज साहनी , दीना पाठक, मोहन सहगल और अनेक साथियों के सात 'जादू की कुर्सी' नाम का नाटक हम अपने साथ ले गए थे। इस नाटक का प्रदर्शन जबलपुर में भी किया गया था। मुंबई लौटने पर बलराज साहनी और सरदार जाफरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उस समय मैं भूमिगत हुआ। कुछ समय बाद मुझे 'इप्टा' का सचिव बनाया गया। नए नए लड़कों को हम इकट्ठा करते थे और 'इप्टा' में नाटक करते थे। 'शांतिदूत कामगार' नाम का नाटक उस समय मैंने लिखा और उसका निर्देशन भी किया। कुछ प्रदर्शनी के बाद पुलिस द्वारा इसे भी मुम्बई में सेंसर कर दिया गया।
'इप्टा' में उस समय ख्वाजा अहमद अब्बास, जसवंत ठक्कर, दीना पाठक, अन्नभाऊ साठे, शंभू मित्रा, उमर शेख, शंकर शैलेन्द्र और बलराज साहनी सबके सब साथ-साथ मिलकर काम करते थे। मैं इन सबके काम से बहुत प्रभावित था चुनांचे 1953 तक हम सब लोग 'इप्टा' के बैनर पर लगातार नाटक करते रहे। पचास वर्ष पहले संस्कतिकर्मियों में प्रतिबध्दता और समर्पण की भावना जबर्दस्त थी। 'इप्टा' के पाँच दर्शकों का इतिहास यह बताता है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लेकर सामंती दमनचक्र का मुकाबला उसने बहादुरी के साथ किया है।
आज इप्टा के अतिरिक्त दूसरे नौजवान भी नुक्कड़ नाटक के माध्य से काफी काम कर रहे हैं। पहले की अपेक्षा अब इक्कीसवीं सदी में 'इप्टा' कम सक्रिय है। जनसंस्कृति में अंतनिहित ऊर्जा को 'इप्टा' के लोग पहचानते हैं। यही कारण है कि पूँजीवादी व्यवस्था में कट्टरपंथ के मुद्दे पर, तमस का प्रसंग हो या सफदर हाशमी की हत्या'इप्टा' ने अपने भूमिका पूरी ताकत से निभाई। हजारों संस्कृतगकर्मियों ने भी उस समय पूरे देश में एकजुटता का परिचय दिया था।
हिन्दी में नाटय लेखन की स्थिति मराठी और बंगला लेखन की तुलना में आज किन परिस्थितियों से गुजर रही है ? क्या हिन्दी में भी मराठी और बंगला रंगमंच की तरह व्यावसायिक रंगमंच का भविष्य उज्जवल है?
मुझे तो बंगला और मराठी की जानकारी कम है। पढ़ने सुनने में आता है कि इन दिनों बंगला नाटक के क्षेत्र में लेखन का संकट है। सतीश आलेकर और अरुण कोलचेवार मराठी में अच्छा लिख रहे हैं। कहानियों के नाटय रूपान्तरण से हिन्दी रंगमंच समृध्द हो रहा है। यह भी नया अंदाज है। हिन्दी में खूब नाटक लिखे जा रहे हैं। लेकिन एक दौर ऐसा आया जिसमें निर्देशन की महत्ता बढ़ती हुई दिखाई दी। रंगमंच का विकास हुआ। देखते ही देखते कविता व कहानी के नाटय रूपान्तरण तथा नाटकों के अनुवाद इतने अधिक खेले गए गए कि हिन्दी नाटक और रंगमंच के बीच की दूरी बढ़ती गई। इसका प्रभाव हिंदी के नाटय लेखन पर भी पड़ा। हिन्दी में नाटक खूब लिखे जा रहे हैं, इसके बावजूद हिन्दी में व्यावसायिक रंगमंच का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई देता।
देश में हिन्दी रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय मंडलियों एवं संस्थानों के संबंध में आप अपने विचार बताएँ?
ढेर सारी मंडलियाँ हैं। संस्थाएँ हैं। नौजवान खूब काम कर रहे हैं। देश भर में जो काम हो रहे हैं उनकी समूची जानकारी मुझे नहीं है। मेरी अपनी सीमाएँ हैं। शंभू मित्र का काम शानदार रहा है। रतन थियेम हैं जिनके नाटकों में गति होती है। उनकी लय में एक जबर्दस्त अनुगंज मिलती है। पणिक्कर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। विजयदान देथा नाटक नहीं करते लेकिन उनकी कहानियों में गजब की बात सामने आती है, ब. व. कारंत के काम में विविधता है, ताकत है। अनेक महत्वपूर्ण काम मैंने देखे ही नहीं हैं। सबके काम का लेखा-जोखा मेरे पास नहीं है। अब अस्सी वर्ष की उम्र में सब कुछ याद रखना भी कठिन है। चुनांचे जिनके नाम छूट गये, यह उनकी उपेक्षा नहीं है। उनको नजरअंदाज करना भी नहीं है। मेरी अपनी सीमाएँ हैं।
हिन्दी में बाल रंगमंच के विकास की क्या संभावनाएँ है ?
बाल रंगमंच पर अच्छा काम हो रहा है। बाल भवन भोपाल है और बाल भवन मुंबई है जहाँ बच्चों के रंगमंच को लेकर एक अच्छी सोच विकसित की गई। अभी हमने भोपाल में तीन दिन की वर्कशॉप की। उसमें पूरे देश के 300 बच्चे आए थे। कर्नाटक से 'शोभा गोआ' आईं थीं जिनके निर्देशन में बच्चों के लिए ढेर सारे मुखोटे बनाए गए। उनके निर्देशन में पूरी तरह संगीतमय नाटक खेले गए। 'एलियांस फ्रांसेस', फ्रेंच एंबेसी का एक कल्चरल विंग है, जिनके सहयोग से पंचतन्त्र की कहानियों पर नाटक तैयार किए गए। नाटक में बच्चों की प्रतिभा देखते ही बनती थी। इस पूरे शिविर में एक सांस्कृतिक ठेठपन था। संथाल नृत्य की झलक के साथ आदिवासियों की अस्मिता देखने लायक रही। तैयार हुए नाटकों के मानव संग्रहालय और बाल भवन में दो शो हुए।
इन सबके साथ काम करते हुए यह बार-बार लगा कि नाटक के क्षेत्र में भी शासकीय दखलंदाजी बहुत अधिक है। फिर भी बच्चों की रूचि और उनके उत्साह को देखकर हमने सहयोग किया। संस्कृति के क्षेत्र में बेहतर काम करने के लिए उसे शासकीय दखलंदाजी से मुक्त रखना बहुत जरूरी है।
आप अपनी दृष्टि से हिन्दी में कुछ अति महत्वपूर्ण नाटकों का उल्लेख कीजिए'अंधायुग', 'कोणार्क', 'आधे-अधूरे', 'आषाढ़ का एक दिन', 'दरौपदी', 'रंगगंधर्व', 'बकरी', 'हानूश', 'कबिरा खड़ा बाजार में', 'इन्ना की आवाज', 'एक और द्रोणाचार्य', 'आदमी जो मछुआरा नहीं था', 'जादूगर जंगल का', 'काशी का जुलाहा' या और कोई नाटक ?
ये नाटक भारतीय रंगमंच के चर्चित नाटक हैं। सबकी अपनी-अपनी रचनाशीलता है, कल्पनाशीलता है। नई पीढ़ी अच्छा काम कर रही है। पुणे में एक बार 'घासीदास कोतवाल' नाटक देखा था, वह आज भी स्मृति में है। वैसे 'आधे अधूरे', नाटक की बात ही निराली है।
नाटक में संगीत, नृत्य और आधुनिक उपकरणों (दृश्य-श्रव्य सामग्री) का प्रयोग आप किस सीमा तक जरूरी मानते हैं। क्या रंगमंच पर इनके प्रयोग की कोई सीमा होनी चाहिए ?
संगीत और नृत्य के साथ चित्रकला, मूर्तिकला सहित कलाओं के जो विविध रूप हैं, उसका ज्ञान, प्रत्येक रंगकर्मी अर्जित करें, यह जरूरी है। निर्देशक को सभी कला विधाओं की अच्छी और गहरी जानकारी होनी चाहिए। थियेटर सामूहिक कला है। एक्टिंग का, म्यूटिक का एक एक सेंस होता है, ग्राफिक आर्ट है, प्लास्टिक आर्ट है, करियोग्राफी है जिसका ताल्लुक पेंटिंग से भी है। इन सबका ज्ञान जितना अधिक हो उतना अच्छा है।
किसी भी रंगकर्मी की सभ ीकलाओं में महारत हो ऐसा व्यावहारिक जीवन में नहीं होता। थियेटर में भी नहीं। मैं भी सारी चीजें नहीं जानता हूँ। हर नई तकनीक के बारे में जानना और अपनी सीमा में उपयोग करना सुखद होता है। भरत मुनि से लेकर आज तक की अद्यतन जानकारी से रंगकर्मी परिचित हो, यह अच्छा और गहरी जानकारी होनी चाहिए। थियेटर सामूहिक कला है। एक्टिंग का, म्यूजिक का एक सेंस होता है, ग्राफिक आर्ट है, प्लास्टिक आर्ट है, कोरियोग्राफी है, जिसका ताल्लुक पेटिंग से भी है। इन सबका ज्ञान जितना अधिक हो उतना अच्छा है।
किसी भी रंगकर्मी की सभी कलाओं में महारत तो ऐसा व्यवहारिक जीवन में नहीं होता। थियेटर में भी नहीं। मैं भी सारी चीजें नहीं जानता हूँ। हर नई तकनीक के के बारे में जानना और अपनी सीमा में उपयोग करना सुखद होता है। भरत मुनि से लेकर आज तक की अद्यतन जानकारी से रंगकर्मी परिचित है, यह अच्छी बात है। इसके बाद भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रयोग की सीमा जरूर होनी चाहिए। कुछ लोग इसके ताम-झाम में भटक गए हैं। चुनांचे थियेटर में भी तड़क-भड़क पैदा करते हैं। पिछले दिनों एक फाइव स्टार होटल के एक प्रोडक्सन में पूरी की पूरी ट्रेन दिखाई गई। उसके बहुत ऊँचे टिकट थे। मुझे लगता है, यह थियेटर के साथ ज्यादती है।
रंगमंच और नाटक की विकासयात्रा में दर्शकों से आप कैसी अपेक्षा रखते हैं ? उनकी क्या भूमिका अब तक रही है ?
कोई भी सच्चा रंगकर्मी नाटक के दर्शक को दोषी नहीं ठहराता। अपने नाटक का आत्मविश्लेषण करता है। दुकानदार के लिए ग्राहक की संतुष्टि का बहुत महत्व होता है और नाटक में दर्शकों की संतुष्टि का। मैं मानता हूँ। कि नाटक की सफलता और असफलता की आखिरी कसौटी 'दर्शक' है। हमने दिल्ली में जब भी नाटक किया, यह देखा और महसूस किया कि थियेटर का हॉल रोज भर जाता था। दिल्ली में नौजवान पीढ़ी के बीच भी अपनी प्रस्तुतियों के प्रति गंभीर किस्म की ललक मैंने देखी है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक जहाँ-जहाँ नाटक किए दर्शकों की कमी नहीं रही। लंदन, जर्मनी और विदेश के दूसरे बड़े शहरों में तथा यूगोस्लाविया में हमने एक दिन में कभी चार, कभी छह शो किए फिर भी हॉल भरा रहता था।
अपने जीवन भर के अनुभव से मैंने यह जाना है कि नाटक की प्रस्तुति में मंच और दर्शकों के बीच बहुत अधिक फासला नहीं होना चाहिए। भोपाल में 'प्रणति' नाम से एक आयोजन हुआ। दिनांक 19 से 24 दिसम्बर 1999 तक छह ('मिट्टी की गाड़ी', 'मुद्राराक्षस', 'चरणदास चोर', 'देख रहे हैं नैन', 'कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना' और 'गाँव के नाव ससुराल मोर नाव दामाद') शो किए। महावीर जी,आपने तो स्वयं एक सप्ताह तक भोपाल में रहकर सभी नाटक देखे हैं और उन पर लिखा भी है। कुर्सियाँ भर जाने के बाद दोनों और की सीढ़ियों को गैलरी बनाकर दर्शक जमीन पर बैठ जाते थे। जगह की कमी के कारण अनेक दर्शकों को बिना नाटक देखे लौटना पड़ा था। आपने स्वयं देखी है दर्शकों की भीड़, उनका उत्साह और उनकी प्रशंसा। एक रंगकर्मी को इससे अधिक और क्या चाहिए।
कौन-कौन से संस्कृत नाटकों का मंचन आपने करवाया है ? वर्तमान स्थितियों में कौन से संस्कृत नाटक प्रासंगिक हो सकते हैं ?
हमारे यहाँ दसवीं शताब्दी तक संस्कृत नाटकों की दीर्घ परंपरा है। सैरे संस्कृत नाटकों और महाकाव्यों का अध्ययन मैंने किया है। कालिदास का 'मेघदूत' अद्भुत है। नाटय निर्देशन के शुरूआती दौर में ही मैंने एक शास्त्रीय संस्कृत नाटक उठाया था। उसका नाम है 'मृच्छकटिकम्' और नाटककार शूद्रक हैं। इसका हिन्दी अनुवाद हमने 'मिट्टी की गाड़ी' नाम से किया। यह 1958 की बात है। इसके बाद 'मृच्छकटिकम्' को पुन: 1978 में हमने छत्तीसगढ़ी बोली में 'मिट्टी की गाड़ी' नाम से किया। यह विश्वप्रसिध्द नाटक है। दुनिया की 50 से अधिक भाषाओं में 'मृच्छकटिकम्' का अनुवाद हो चुका है।
एकांकी नाटक लिखने वालों में भास का पहला नाटककार माना जाता है। भास ने कुल तेरह एकांकी नाटक संस्कृत में लिखे हैं। उनके तीन एकांकी नाटकों ('पंचरात्रम्', 'दूतवाक्यम्' और 'करणभारम') को हमने 'दुर्योधन' के नाम से किया। संस्कृत साहित्य में भास बहुत बड़े नाटककार हैं। सारी दुनिया जिस कालिदास का लोहा मानती है, 'मेघदूत' और 'भिज्ञानाशाकुंतलम्' लिखने वाले उसी कालिदास ने अपने नाटक 'मालविकाग्निमित्रम्' की भूमिका में लिखा है'आज जब भास के नाटक चर्चित होकर लोकप्रियता के शिखर को पार कर चुके हैं तब भी मैं नाटक लिखने को दुस्साहस कर रहा हूँ, यह लिखकर उन्होंने भास की विलक्षण प्रतिभा का सम्मान किया।
1968 में विशाखदत्तके संस्कृत नाटक 'मुद्राराक्षस' को हमने अंग्रेजी भाषा में खेला और 1996 में इसी नाटक को हिन्दी में भी किया। इसी प्रकार संस्कृत नाटककार भवभूति का नाटक 'उत्तररामचरितम्' हमने 1971 में किया था। संस्कृत के ही नाटककार भट्टानारायण का संस्कृत नाटक 'वेणीसंहार' अभी 2001 में तैयार हुआ है। हमारे आज के समय में भी यह बहुत प्रासंगिक है। 'पंडवानी' के प्रयोग ने इसे और अधिक जीवन्त बना दिया है।
संस्कृत रंगमंच और नाटयशाला की परंपरा भारतीय रंगमंच की पहचान बनाने में किस रूप में सहायक हो सकती है ?
नाटयशाला की परंपरा की बात आती है तो हमारे यहाँ भरत का नाटय शास्त्र बहुत पुराना है। आज भी उनके सिध्दान्त बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे संस्कृत नाटक मुझे बेहद अनुकरणीय लगते हैं। पूरे भारत में संस्कृत के नाटक, नुक्कड़ नाटक, कविता और कहानी के नाटय रूपान्तरण, बंगला और मराठी सहित दूसरे भाषाओं के नाटक और दूर-दराज के क्षेत्रों में नाना प्रकार के लोकनाटय खेले जाते हैं, चुनांचे भारतीय रंगमंच की कोई विशिष्ट धारा या अलग पहचान नहीं बन पायी है। भारतीय रंगमंच का जो भी स्वरूप बना है उसमें नाटयशास्त्र की परम्परा का बड़ा सहयोग है। टाइम, स्पेस और एक्शन के साथ नाटक में गति अरस्तू के अनुसार होती है। यह हमारे संस्कृत नाटकों में नहीं नजर आती। कुछ सिध्दान्त समयानुसार बदलते जाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं बासी बातों को लांघ जाता हूँ। ऐसा माना जाता रहा है कि 'आदमी का मरना मंच पर नहीं दिखाना चाहिए' लेकिन मैंने दिखाया है। मैं हमेशा नई चीज, नया मैसेज निकालकर दर्शकों तक पहुँचाने की कोशिश में छोटे-मोटे फेरबदल करता रहता हूँ। विशेष तत्व को उजागर करना जरूरी माता हूँ। कथा कितनी ही पुरानी क्यों न हो, उसके मूल तत्व में से गहराई निकलनी चाहिए। रचनाशीलता और कल्पनाशीलता के लिए अपनी जमीन अधिक उर्वर होती है। मैंने जितने भी संस्कृत नाटक उठाए हैं उसमें वर्तमान का उपयोग है। नाटक के भीतर आज की जिंदगी की झलक, मिलनी ही चाहिए। 1982 में हम पहली बार ऐडिनबरा गए थे। हिन्दुस्तान से एक ही नाटक था'चरणदास चोर'। जापान, अमरीका, इटली, यूरोप के देशों से कुल बावन नाटक आए थे। उन बावन प्रविष्टियों में 'चरणदास चोर' को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। कई लोगों ने मुझसे पूछा कि इसकी क्या विशेषता है ? मैंने बताया कि नई जगह और नए दर्शक देखकर भी हमारे कलाकर डरे नहीं, उन्होंने वैसा ही अभिनव किया जैसे गाँव में करते रहे हैं। उनके अभिनय में जो खुलापन था, जो बेबाकी थीउसको सबने पसंद किया। हमारे संस्कृत साहित्य में एक मूल रूप है, 'रस के सिध्दांत'। चुनांचे रस की एकता के साथ खुलापन और बेबाकी मैं बहुत जरूरी मानता हूँ।

मराठी व बंगला नाटकों के अनुवाद के साथ ही कविताओं और कहानियों के नाटय रूपान्तरण मंचित किये जा रहे हैं ? क्या यह रंगमंच का विस्तार है ? या हिन्दी में मौलिक नाटकों की कमी के कारण ?
दूसरी भाषाओं से नाटकों के हिन्दी अनुवाद, कविता और कहानियों का मंचन रंगमंच का विस्तार जरूर है। रंग जगत में एक प्रवृत्ति इधर विकसित हो रही हैपका-पकाया माल खाने की। मराठी और बंगला में कोई नाटक हिट हुआ, चुनांचे उसका हिन्दी अनुवाद किया या करवाया गया। ऐसा करने में रिस्क बहुत कम हो जाता है। बड़े नामधारी लेखक की कहानी या कविता के नाटय रूपान्तरण में भी कुछ ऐसा ही है। हिन्दी में लिखा गया नाटक उठाने का रिस्क कोई क्यों ले ? एक जुमला चल निकला है, निर्देशक ने भी एक वाक्य कहा'हिन्दी में नए नाटक नहीं है।' और छुट्टी पा ली। मैं पूछता हूँ, अगर आप हिन्दी में थियेटर कर रहे हैं तो आपने कौन-कौन से हिन्दी के नाटक पढ़े ? हिन्दी के कौन-से नाटक खोजे ? और यह जानने की कोशिश की कि हिन्दी में कौन-कौन से नए नाटक लिखे गये हैं ? आप यह समझिए कि यह आलोचना नहीं, एक वस्तुपरक विश्लेषण है। मैं यह नहीं कहता कि ये प्रयोग नहीं होने चाहिए।
यह हर क्षेत्र में खुलापन जरूरी है। ये सभी प्रयोग जरूर हों। नई पीढ़ी के रंगकर्मियों को हिन्दी के नए नाटक खेलना चाहिए। मैं यह मानता हूँ कि हिन्दी में मैलिक नाटकों की कमी नहीं है।
आधुनिक रंगमंच पर पारसी थियेटर के प्रभाव के बारे में आपके विचार जानना चाहते हैं।
पारसी थियेटर में चमत्कार बहुत होता था। उस समय चमक-दम वाली वेशभूषा का बोलबाला था। पारसी थियेटर अपनी सोच में, अपने पूरे कलेवर में पूरी तरह व्यावसायिक रहा है, चुनांचे पारसी थियेटर का मूल उद्देश्य जनता का मनोरंजन करके पैसा कमाना ही था। हम आज जिसको भी आधुनिक रंगमंच कहते हैं उस पर पारसी थियेटर का कोई प्रभाव नहीं है।
ब्रेश्त की शैली बहुचर्चित और लोकप्रिय क्यों है ? प्रतिबध्द रंगमंच आपकी दृष्टि में क्या है ? क्या आप इसे अनिवार्य मानते हैं ?
सही मूल्यों की पुर्नस्थापना की प्रतिबध्द रंगमंच है। नाटक का मकसद सस्ती लोकप्रियता हासिल करना नहीं है बल्कि लोगों को फूहड़ और हल्के मनोरंजन से हटाकर श्रेष्ठ रंगमंच की ओर ले जाना है। ब्रेख्त के साथ-साथ स्तानिस्लावस्की की भी अपनी शैली है। सबकी फरफारमिंग थ्योरी का अपने स्थान पर बहुत महत्व है लेकिन ब्रेख्त की बात ही निराली है। मैं ब्रेख्त से मिलना चाहता था। 1956 में यूरोप की सैर करते हुए, वहाँ के अनेक देशों के थियेटर को देखते हुए जब मैं बर्लिन पहुँचा तो कुछ सप्ताह पहले ब्रेख्त का निधन हो चुका था। लेकिन ब्रेख्त के सभी नाटक वहाँ उपलब्ध थे। मैंने उन्हें देखा। उनका अभ्यास भी मैंने देखा। ब्रेख्त के नाटकों का अभ्यास उनके दो विशेष शिष्यों द्वारा जो जानेमाने निर्देशक थे, साथ मिलकर किया जा रहा था। इनमें से एक थे महान अभिनेता एम्सहार्ड, वह ब्रेख्त के दामाद थे। दूसरे अर्नस्ट बुश 'मदर करेज' के बावर्ची थे। वह उत्कृष्ट गायक और श्रेष्ठ अभिनेता थे।
ब्रेख्त के नाटक देखकर मैंने जाना और समझा कि ब्रेख्त अपनी विराट सोच में टोटल थियेटर की बात करते हैं। बुनियादी तौर पर थियेटर हमेशा समसामयिक होता है। अपना विजन या अपनी दृष्टि दर्शकों तक पहुँचाना नाटक की सफलता है। चुनांचे समकालीन रंगमंच के चिंतन में भी यह बिन्दु बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ड्रामे के विकास के सिलसिले में संगीत, कविता, गाना, कथानक, कॉस्टयूम्स, नृत्यये सब मिलकर विषयवस्तु को आगे बढ़ाएँकभी विरोध करके तो कभी सहज रूप में आगे बढ़ाएँ। दर्शक नाटक देखकर, संतुष्ट होकर घर जाकर सो न जाए, वरन् कुछ बेचैन हो सोच-विचार करे। मैंने ब्रेख्त से यही सीखा है।
लोकनाटय शैली को लेकर इधर कई प्रयोग हुए हैं। इस विषय में कुछ कहना चाहेंगे। लोक शैली अभिनेता प्रमुख हो जाता है ? क्या इससे निर्देशक के नियामक भाव को ठेस लगती है?
निर्देशक के नियामक भाव को ठेस नहीं लगती। आप जानते हैं, मेरे नाटक के हर शो में कुछ न कुछ बदल जाता है। अशोक वाजपेयी ने एक बार कहा था'हबीब नाटक को बार-बार ठीक करते हैं।' नाटक को मैं जड़ नहीं होने देता। किसी एक फ्रेम में बाँधकर नहीं रखता। उसमें स्थायित्व या बासीपन नहीं आने देता। इसके लिए हमारे कलाकार रिहर्सल भी पूरे दमखम के साथ करते हैं। लोककथाओं में बहुत से तत्व एक साथ होते हैं। किसी एक तत्व की ओर, एक दिशा की ओर जाते हुए छोटे-मोटे फेरबदल करता रहता हूँ। संदेश की गहराई बदल जाती है और प्रस्तुति अधिक जानदार होकर सीधे दर्शकों के दिमाग तक पहुँचती है।
गाँव की चौपाल में, शहरों के आधुनिक मंचों पर और सारी दुनिया के महानगरों में जहाँ-जहाँ भी 'चरणदास चोर' खेला गया वहाँ बच्चों ने, बूढ़ों ने, जवानों ने, महिलाओं ने इसे बेहद सराहा है। मुझे हमेशा बहुत सुख और संतोष मिला है। मुझे कभी ठेस नहीं लगी। तालियों की गड़गड़ाहट आज भी कान में गूँजीत है। पिछले तीस वर्षों का मेरा अनुभव है। 'चरणदास चोर' में लालू, मदन और भुलवा चोरी का अद्भुत हुनर इतनी बेवाकी और विलक्षणता से दिखाते हैं कि दर्शक रोमांचित और अभिभूत हो जाते हैं। दूसरे भाषा-भाषी दर्शकों तक भी नाटक सहजतापूर्वक संप्रेषित होता रहा है।
निर्देशक की सफलता तभी है जब ऐसा नजर न आए कि निर्देशन थोपा हुआ है। मैं यह मानता हूँ कि अभिनेता और दर्शक के बीच निर्देशक को नजर नहीं आना चाहिए। सारा का सारा प्रयास अभिनेता के भीतर के जौहर को बाहर निकालना होता है।
आपने अपने कौन-कौन से नाटक में लोकनाटय शैलियों का प्रयोग किया है ? इसका स्वरूप क्या रहा है ? इन प्रयोगों के पीछे कोई विशेष उद्देश्य रहे हैं?
लोक शैली का प्रयोग लगभग सभी नाटकों में किया है। लेकिन नाटक के अनुसार शैली बदलती रही है। मेरे नाटकों को केवल लोक शैली के नाटक कहना सही नहीं है। लोक शैली के अलावा बहुत कुछ सम्मिलित रहता है। छत्तीसगढ़ के अधिकांश लोक कलाकारों में अभिनय की विलक्षण प्रतिभा मैंने देखी है। मेरे साथ जितने कलाकारों ने काम किया है उनमें लगभग सभी ने नाटक के पात्र बदल जाने पर भी शानदार अभिनय किया है, देश-विदेश के अनेक नाटय समीक्षकों को यह बात आश्चर्यचकित करती रही है कि हमारे कलाकार किसी भी पात्र का अभिनय सहज ढंग से कर लेते हैं। दूसरे पात्रों के संवाद भी उन्हें याद रहते हैं, चुनांचे अचानक किसी कलाकार के न रहने पर भी जब वे नाटक में दूसरे पात्रों का अभिनय करते हैं। पूरी बेबाकी और दमदारी के साथ संवाद बोलते हैं।
मेरा हक नाटक एक अलग शैली लेकर आता है। पीटर ब्रुक ने मेरे नाटकों के बारे में लिखा है'हबीब तनवीर एक ऐसे शहरी अभिजात्य नाटककार हैं जो लोक कलाकारों के साथ नाटक करते आए हैं लेकिन बिना उनकी संवेदाना को संकुचित करते हुए, बिना उन्हें एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हुए।'
चुनांचे मेरे नाटक लोक नाटय नहीं है। यदि आप मेरे नाटकों के बारे में लिख रहे हैं तो सावधानी रखिए। मेरे नाटक लोक शैली, लोक अभिनेता, लोक अभिनेत्री और लोक संगीत से तैयार किए हुए आधुनिक नाटक हैं। हमारे समय के जो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, उन्हीं को मैंने अपने नाटकों में उठाया है। -साभार : आजकल 2003