1 सितम्बर, 1923 के बैजनाथपारा रायपुर म एक अनोखा लड़का के जनम होईस, जेखर खून म छत्तीसगढ़ के माटी के महक रहिस हे अऊ लोककला ओखर खून म दउंड़त रहिस हे। हाड़-मांस के साधारन देह ल देखके कोनो भी ये नई कहि सकतिस के ये ह उही हबीब तनवीर आय, जेन ह इहां के लोककला ल बिदेस तक पहुंचईस।
तीजन बाई पंडवानी के मशहूर गायिका के गायन ह भिलाई स्टील प्लांट ले निकल के दुनिया म गूंजत हावय। छत्तीसगढ़ के एक पहिचान बनगे हावय।
हबीब ह 1954 म मुम्बई गीस। कुछ थियेटर म काम करे के कोशिश करीस। वो समय म मुक्का सिनेमा दम तोड़ दे रहिस हे अऊ बोलत सिनेमा के जोर रहिस हे। अइसना समे म तनवीर ल कुछु नवा करे के सूझीस। थियेटर के नवा तरीका सीखे बर इग्लैंड चल दीस। ऊहां के चकाचौंध ओला रोक नई सकिस अउ कुछु नाटक के बारीकी सीख के वापस अपने डीह-डोंगर म आगे। अपन सीखे बारीकी के उपयोग ल छत्तीसगढ़ के लोक कला ल बचाय बर करीस। कतकोन नाटक म अपन अभिनय घलो करिन।
'आगरा बाजार', 'चरणदास चोर', 'मिट्टी की गाड़ी', 'बहादुर कलारिन' सरीख नाटक मन के मंचन करीस। रंगमंच ल नया दिशा देखइस। लोकगीत, लोकनाटय संग एक नया प्रयोग हमेशा करीस। दूसर भासा जइसे अंगरेजी अउ संस्कृत के नाटक मन ल छत्तीसगढ़ी म करीस। कलाकार कहां के रहिन हे? जमीन के कलाकार ल उठा के मंच म चढा दिस। अपन नाटक के माध्यम ले सोसन करईया मनखे मन के विरुध्द आवाज उठाईस। कमजोर अउ गरीब मन के पीरा ल मंच के माध्यम ले दुनिया के आगू म लानिस ये ह बहुत हिम्मत के काम आय। हर नाटक म लोक संस्कृति के झलक मिलत रहिस हे।
हबीब तनवीर ल पद्मभूषण, पद्मश्री अउ संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिले रहिस हे। लोक नाटय ल जाति, समूह, गांव, जिला अउ राज्य ले आघू बढ़ के देस अऊ बिदेस तक पहुंचइस। एक सम्मानजनक इस्थान देवइस। नाचा अऊ लोकनाटय दूनों के कोनों लिखित साहित्य नइए पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक दूसर करा आवत हे। इही बिखरे अउ सुस्त परे लोककला ल मंच देके आक्सीजन देके जीवित राखे हावय।
हबीब ह सात नाटक लइकामन बर घलो लिखे हावय। हबीब ल ननपन ले नाटक के सऊंक रहिस। लइकापन ले नाटक म काम करत रहिस हे। करीब 5-6 साल के उमर ले इही उमर म वो ह नाटक के भाव ल आत्मसात कर लेवय। रफीक अब्दुल्ला के लिखे नाटक 'मोहब्बत के फूल' के मंचन होईस। येमा नाटक के नायक ह नायिका संग अब्बड़ मोहब्बत करत रहिस हे। फेर ये समाज के विरुध्द रहिस हे। नायक ल जंजीर म बांध के एक गुफा म कैद कर देथे। नायिका ह जुदाई ल सहि नई सकय अऊ जंगल-जंगल, गली-गली खोजथे। अब्बड़ रोथे। अंत म नायक संग भेंट हो जथे। ये 'मोहब्बत के फूल' नाटक म नायिका के भूमिका बालक हबीब के बडे भाई ह करत रहिस हे। नायिका ह दर्द म जब कलपथे त, हबीब ह ओखर भाव म बूड़ जाय अउ जोर-जोर से रोय ले लगय। जब-जब ये नाटक ल देखय तब-तब रोवय। ये बात ल वो ह जानत रहिस हे के ये नायिका ह लड़की नहीं ओखर बड़े भाई आय। ये नाटक आय। हबीब ह नायिका के दर्द ल आत्मसात कर लेवय। ये सह-अनुभूति, अपन अउ दूसर, यथार्थ अउ कल्पना एक हो जाथे। वस्तु जगत अउ भाव जगत एक हो जथे। इही अनुभूति ह हबीब ल ऊंचाई तक पहुंचइस।
लड़का मन बर सात नाटक लिखिस अउ ओखर मंचन करइस, 'गधे', 'परम्परा', 'हर मौसम का फूल', 'दूध का गिलास', 'चांदी का चम्मच', 'कारतूस', 'बच्चों की दुनिया' माई नाटक रहिस हे। हबीब के ये लड़कामन के नैसर्गिक प्रतिभा ल उभारे के कोशिश रहिस। दूसर डाहर गांव-गांव के भीतर ले लोक कलाकार ल खोज के मंच देवाय के काम करीस। छत्तीसगढ़ी भासा ल छत्तीसगढ़ ले निकाल के बिदेस तक पहुंचइस। हमर लोककला के परचम विश्व म लहरा के आगे। अइसना मनखे दुबारा पैदा हो नई सकय। अइसन अनोखा मनखे ल मड़ई परिवार डाहर ले श्रध्दांजलि देवत हावन।
छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र सुप्रसिध्द रंगकर्मी, कवि और अभिनेता हबीब तनवीर का निधन अंचल के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके निधन से विश्व रंगमंच के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अवसान हो गया। उन्होनें भारतीय रंगमंच को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। पारंपरिक कलाओं के प्रयोग से हिंदी रंगमंच को उन्होेंने नया स्वरूप प्रदान किया था। उनका जन्म छत्तीसगढ क़े रायपुर में एक सितबर 1923 को हुआ था। स्कूली शिक्षा रायपुर और कला स्नातक की पढ़ाई मॉरीश कॉलेज नागपुर से करने के बाद वे स्नातक करने अलीगढ़ गये।
युवावस्था में उनका झुकाव साहित्य व कविता की ओर था। इसी दौरान तनवीरं उपनाम उनके साथ जुड़ा। वह वर्ष 1947 में मुंबई गये और ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ गये। इसी दौरान कुछ फिल्मों में गीत लिखने के साथ अभिनय भी किया। बाद में वे प्रगतिशील लेखक संघ और इंडियन पीपुल्स थियेटर इप्टा से जुडे। ब्रिटिश काल में जब इप्टा से जुटे वरिष्ठ रंगकर्मी जेल में थे, उस दौरान उन्होंने इस संस्थान को संभाला। 1954 में उन्होंने दिल्ली प्रस्थान किया और उन्होंने कुदेशिया जैदी के हिन्दुस्तान थियेटर के साथ काम किया। इसी दौरान उन्होंने बच्चों के लिए भी कुछ नाटक किए दिल्ली में ही उनकी भेंट रंगमंच से जुड़ी मोनिका मिश्र से हुई, जो उनकी जीवन संगिनी बनी। यही उन्होंने अपना पहला नाटक आगरा बाजारं खेला। सन् 1955 में वे इंग्लैण्ड गये और रॉयल एकेडमी और ग्रामेटिक्स आर्टस में रंगमंच के सबंध में गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान उन्होंने यूरोप के थियेटर को काफी निकट से देखा और समझा। सन् 1958 में जब वे लौटे तब वे खुद को एक प्रसिध्द निदेशक के रूप में ढाल चुके थे। इसी दौरान नया थियेटर की नींव तैयार हुई और छत्तीसगढ़ के छह लोक कलाकारों के साथ उन्होंने 1959 में नया थियेटर प्रारंभ किया। नया थियेटर में भारत के साथ-साथ विश्व रंगमंच में आपने अमिट छाप छोड़ी। चरणदास चोर, उनकी कालजयी कृति है। यह नाटक भारत सहित दुनिया में जहां भी हुआ सब तारीफों का पुलिंदा अपने साथ लाया। छत्तीसगढ़ की नाचा शैली में 1972 में किया गया उनका नाटक ंगांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद ं ने भी खूब प्रशंसा पाई। आस्कर विजेता फिल्म गांधी सहित कई फिल्मों में अभिनेता के रूप में भी कार्य किया। हबीब तनवीर की जीवन शैली काफी सादगी पसंद थी। वे बड़े स्वाभिमानी थे इसीलिये वे सत्ता के गलियारे से सदैव दूर रहे। उन्होनें अपना सारा जीवन रंगमंच के लिए समर्पित कर दिया। अंतिम सांसो तक वे कर्मशील रहे।
वे अपनी आत्मकथा पर काम कर रहे थे। यह पुस्तक लगभग पूर्ण हो गई है। नगेन उनकी एकमात्र बेटी है। अब उस पर उनकी पुस्तक व कला विरासत को आगे बढ़ाने की जिमेदारी आ गई है। वे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार व पद्मभूषण से नवाजे गये थे। वर्ष 1972 में वे रायसभा सदस्य भी रहे। उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से जनता की आवाज को सामने रखा और भारतीय लोकतंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ बनाया। भारतीय रंगमंच की इस महान हस्ती को हमारा सादर नमन्।