मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है

वरिष्ठ प्रगतिशील कवि डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया से डॉ. राजेश कुमार की बातचीत

मैं डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया के आवास पर एटा पहुँचा। उनसे मिलने के लिए मैंने डोर बैल बजाई। अन्दर से श्रीमती गार्गी देवी (सिसौदिया जी की पत्नी) ने कमरे का दरवाजा खोला। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने मुझे बैठने को कहा। मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने डॉ. सिसौदिया जी के बारे में पूछा। वे बोलीं - प्रतीक्षा कीजिए, डॉ. साहब अभी आ रहे हैं।

साफ-सुथरे कमरे में टंगा अभिनन्दन-पत्र सिसौदिया जी के कवि-व्यक्तित्व की प्रगाढ़ता को व्यंजित कर रहा था। सिसौदिया जी की कुछ कविताओं का स्मरण कर मैं विचारमग्न हुआ ही था कि सिसौदिया जी ने कमरे में प्रवेश किया।

मैंने उठ कर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने स्नेहसिक्त भाव से मुझे अपने पास बैठाया। मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछा - राजेश जी, पहले अपने स्वास्थ्य की चिंता करो, साक्षात्कार आदि तो बाद में भी लिया जा सकता है। अपने स्वास्थ्य लाभ की मैंने उन्हें जानकारी दी।

तब वे प्रसन्न हुए। कुछ देर बाद उन्होंने कहा - आजकल त्रिलोचन जी का स्वास्थ्य कैसा है ? मैंने कहा कि मैंने फोन पर त्रिलोचन जी की वकील पुत्रवधू उषा सिंह से उनका हाल-चाल जाना है। वैसे 2003 ई. से मैं प्रतिवर्ष त्रिलोचन जी से मिलता रहा हूँ मैंने कई बार उनसे लम्बी बातचीत भी की है। इस अवस्था में उनका पूरी तरह स्वस्थ होना मुश्किल जान पड़ता है। 2005 में अल्सर की गंभीर बीमारी में एक्टिव ब्लीडिंग से त्रिलोचन जी को रक्ताल्पता हुई थी। उनकी वकील पुत्रवधू उषा सिंह ने ही त्रिलोचन जी को सी.एम.आई. देहरादून में भर्ती कराया। आजकल उषा सिंह जी ज्वालापुर (हरिद्वार) में त्रिलोचन जी की देखभाल कर रही हैं। उनका सेवा-भाव प्रसंसनीय है।

इसके उपरान्त त्रिलोचन जी के संदर्भ में अपना ध्यान केंद्रित कर डॉ. सिसौदिया बताते हैं - कवि-साहित्यकार के रूप में ऐसा आदमी दूसरा नहीं है। त्रिलोचन जी की सहजता तथा मनुष्यता दोनों उच्चकोटि की हैं। त्रिलोचन जी से नागरी प्रचारिणी सभा काशी में मेरी एक बार भेंट हुई। एक बार मैं उनसे जबलपुर में मिला। इतने महान होने के बावजूद सहजता ही उनकी असाधारणता है। वे ज्ञान और स्मृति के भण्डार हैं।

इसके पश्चात मेरे लिए जल मंगाया गया है। मैं जल पीता हूँ। तब मैं उनसे पूछता हूँ - आपकी पहली प्रकाशित कविता कौन-सी है?

डॉ. सिसौदिया - मेरी पहली प्रकाशित कविता शोणित के नाले है। यह कविता 43-44 में हंस में प्रकाशित हुई। इस कविता में मेरे कवि व्यक्तित्व की व्यंजना है। मेरे प्रधम कविता संग्रह च्बंगाल के प्रति तथा अन्य कविताएं में यह कविता है। प्रगतिशील आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने मेरी इस कविता की जम कर प्रशंसा की है।

राजेश कुमार - आपकी शोणित के नाले कविता में दुर्घर्ष अपराजेयता, बीमारी से लडने का भाव तथा मानवता का विचार-बोध निहित है। सुना जाता है कि यह कविता आपने बीमारी के दौरान ही लिखी थी। क्या इस कविता को आपके संस्कार-वृक्ष का बीज कविता कहा जा सकता है।

डॉ. सिसौदिया - हाँ, आपने एकदम ठीक सोचा है। जरा कविता सुनिए-
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले।
क्यों मेरे ही दरवाो पर रोगों ने डेरे डाले?
मन ने तन से कहा, साथ दो, पर पाया कोरा उत्तर।
हुए तटस्थ कुटुम्बी साथी कुछ आतंकित-से हो कर॥
किन्तु न वे कायर सब मुझको हतोत्साह करने वाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
युग से पिछड़े हुए हितैषी सड़ी सीख देने आते।
मैं अपनी रस्सियाँ तोड़ता, वे अपनी ताने जाते।
वे न साथ मेरा दे सकते, मैं भी खूब समझता हूँ।
चलता अपने पाँव, नियति का टूटा यान न चढ़ता हूँ।
तोल लिया मैंने अपना बल, देखूँ फौलादी ताले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥

राजेश कुमार - आपके कविता-संग्रह बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ में गांधी-जिन्ना मिलन पर एक कविताहै- देश के दो हाथ मिल कर। गांधी-जिन्ना मिलन की असफलता पर आप क्या कहेंगे?

डॉ. सिसौदिया - जिन्ना की जड़ता तथा हठधर्मिता के कारण यह वार्ता परिणामहीन रही। एकता स्थापित करने के लिए जितना उद्योग गांधी कर सकते थे, उन्होंने किया। लेकिन जिन्ना अपनी जिद पर अड़े रहे। अंतत: बातचीत बेनतीजा रही।

राजेश कुमार - आपकी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना है। मेरे विचार से राजनैतिक पूर्वाग्रहों से कविता की शक्ति कमजोर होती है। इस संबंध में आप का क्या अभिमत है?

डॉ. सिसौदिया - आप का कथन लगभग सही है। आज के जीवन में राजनीति का स्थान बन गया है। कविताओं में राजनैतिक चेतना नहीं होनी चाहिए। नारेबाजी से कविता कमजोर होती है। प्रगतिशील कविता में जहाँ नारेबाजी है, वहाँ संवेदनात्मकता का अभाव है। सांस्कृतिक चेतना के अभ्युदय से कविता प्राणवान होती है। मेरी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना होने से कविता की शक्ति कमजोर हुई है। बाद में मैं किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त हो गया हूँ। मैंने कोशिश की है कि कविता नारेबाजी से बचे। लाल सेना की नारेबाजी से बच कर साहित्य लिखा जाता, तो बेहतर होता। त्रिलोचन जी की कविताएँ इस दृष्टि से बेजोड़ हैं। वे भारतीय जन-संदर्भों से कविता उँचाई पर ले जाते हैं।

राजेश कुमार - 1965 के भारत-पाक युध्द के संदर्भ में सूली और शांति आपका लोकप्रिय काव्य-ग्रंथ है। इस काव्य ग्रंथ में कश्मीर के प्राकृातिक सौंदर्य का जैसा चित्रण है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें युध्द का वर्णन भी अद्भुत है। इस ग्रंथ के बारे में आपकी क्या राय है?

डॉ. सिसौदिया - च्सूली और शांति भावदशा और मनोदशा की अच्छी कृति है। कश्मीर-सुषमा की प्रशंसा रामविलास जी ने भी की है। 1959 के आसपास कश्मीर में एक भ्रमणकारी दल के साथ गया। भ्रमणकारी योजना केन्द्र की थी। इसमें करीब सौ लोग गए थे। डल झील के किनारे निशातबाग था। इसमें हम ठहरे थे। सुबह बसों में निकल जाते थे, रात को आते थे। इसलिए इस वर्णन में इतना यथार्थ है। चेकोस्लोवाकिया का एक युवा भी यहीं मिल गया। वह हिंदी-प्रेमी भी था। युध्द का वर्णन रेडियो सुनने तथा समाचार-पत्र पढ़ने के आधार पर है। लोगों ने इसे सराहा है।

राजेश कुमार - डॉक्टर साहब, क्या आप अपनी साहित्यिक उपलब्धियों से परितुष्ट हैं?

डॉ. सिसौदिया - अगर मुझे चार-पाँच वर्ष और मिल जाएँ तो साहित्य के लिए कुछ विशिष्ट दे सकूँगा। एटा में रहने के कारण वह नहीं दे सका, जो मुझे देना चाहिए था। साहित्यिक क्षेत्र में दो चीजें बाधक बनीं - छोटी जगह, प्रधानाचार्य का पद। मैं अविनाशी सहाय आर्य इण्टर कॉलेज का प्रधानाचार्य रहा। मुझे कॉलेज के प्रबंधक परेशान करते रहे। मैं ईमानदार था। कोई मेरा बाल बाँका नहीं कर सका। आजकल च्संपत्ति चिंता नामक प्रबंध काव्य लिख रहा हूँ। यदि पूरा कर सका, तो ठीक रहेगा। इसमें मैं राम से अन्तर-विरोधों के प्रश्न करता हूँ। राम निरुत्तर भाव से जल समाधि लेते हैं।

राजेश कुमार - आप अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति किसे मानते हैं ?

डॉ. सिसौदिया - यह बता पाना थोड़ा मुश्किल है। बात की चिड़िया से मैं संतुष्ट हूँ। इसमें बौध्दिक चिंतन है। यह मुक्त छंद का संग्रह है। इसमें मेरी विचारधारा का विस्तार है। वैस अभी हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक कृति च्बेहतर दुनिया के लिए संघर्षों के सहयात्री लिख कर मुझे सर्वाधिक प्रसन्नता है।

(इसी बीच डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया यह कह कर उठ कर गए हैं कि मैं आपको यह पुस्तक भेंट करता हूँ। दो-तीन मिनट बाद पुन: उसी स्थान पर बैठे हैं। पुस्तक पर मेरे लिए कुछ लिख कर हस्ताक्षर किए हैं।)

इसके पश्चात मैं पूछता हूँ - डॉक्टर साहब, संस्मरणात्मक लेखन में किन-किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए ?

डॉ. सिसौदिया - सफल संस्मरण में अपने को सामने नहीं रखना चाहिए। होता क्या है, लोग स्वयं को हाइलाइट करते हैं। मैंने स्वयं को हाइलाइट नहीं किया। संस्मरण जिस के बारे में लिखा जा रहा है, उसी को हाइलाइट किया। किसी भी प्रकार की कुण्ठा को संस्मरण में स्थान नहीं देना चाहिए। संस्मरण में आरोपण की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

राजेश कुमार - डॉक्टर साहब, 1942 के क्विट इंडिया मूवमेंट में आपकी सक्रियता रही ैह। यद्यपि उस काल में आप बी.ए. के विद्यार्थी रहे, फिर भी आपने अपना योगदान किया है। इस बारे में आप बताइए?

डॉ. सिसौदिया - मैं आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से संबध्द था। यू.पी. ब्रांच में कार्य करता था। इसका उद्देश्य आाादी के लिए छात्रों को प्रेरित करना था। शिवदान सिंह चौहान भी इस में थे। प्रगतिशील विचारों को प्रसारित करना भी हमारा ध्येय था।

जब बम्बई (आजकल मुम्बई) में भारत छोड़ो आंदोलन का नारा देने वाले कांग्रेस के सब नेता गिरफ्तार किए गए, तब आगरे में विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला। मैं सेण्ट जोन्स कॉलेज, आगरा में बी.ए. का छात्र था। थाना हरीपर्वत पर एस.पी. ने जुलूस को तितर-बितर करना चाहा। मैं नेतृत्व कर रहा था। शाम चार बजे से ले कर रात सात बजे तक पुलिस से पथराव हुआ। दूसरे दिन मेरी गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ।

राजेश कुमार - आज की आलोचनात्मक-पध्दति पर आपकी क्या राय है। आपकी दृष्टि में हिंदी में सफल आलोचक कौन हैं ?

डॉ. सिसौदिया - आज की आलोचनात्मक-पध्दति वैयक्तिक ज्यादा है, साहित्यिक और सैध्दांतिक उतनी नहीं है। आज की आलोचनात्मक पध्दति उतना प्रभावित नहीं करती है, जितना करना चाहिए। आलोचक या तो स्वयं को हावी कर देता है या आलोच्य को। आलोचना संतुलित होनी चाहिए। हिंदी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सबसे सफल आलोचक हैं। उनके बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम भी आदरणीय है। रामविलास जी की आलोचना में कहीं-कहीं वैयक्तिकता है। उनकी सीमाएँ हैं। वे जिससे खुश हों, उसे आसमान पर बिठा देते हैं, जिससे नाराज हों, उसे हीनमान बताते हैं। इसके बावजूद उनकी आलोचना ठीक है। कुछ लोगों ने रामविलास जी की आलोचना से असहमति तो जताई है लेकिन उनकी मान्यताओं का सप्रमाण खण्डन नहीं किया है।

राजेश कुमार - आपको कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं ?

डॉ. सिसौदिया - मुझे दो पुरस्कार मिले हैं। बाद में साहित्यिक राजनीति का शिकार रहा। च्सूली और शांति पर उत्तर-प्रदेश हिंदी समिति का पुरस्कार 68-69 में मिला। 1975-76 में च्दीवारों के पार पर बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार मिला। हमारे देश में पुरस्कार भी राजनीति से प्रेरित हैं। मेरी किताबें भी देर से प्रकाशित हुईं। राजनीति भी बदल चुकी थी।

राजेश कुमार - आप किन-किन कवियों से प्रभावित रहे हैं ?

डॉ. सिसौदिया - मैं आरंभ में मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत से प्रभावित रहा हूँ। राष्ट्रीयता के मामले में एक सीमा तक दिनकर से प्रभावित हूँ। बाद में निराला का प्रभाव मुझ पर है। रचनात्मक प्रेवग मेरा अपने आप का है। (इसी बीच डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया चाय नाश्ते के लिए कहते हैं। उनका एक नौकर चाय-नाश्ता ले कर आया है। हम दोनों चाय-नाश्ता करते हैं।)

इसके अनन्तर सिसौदिया जी थोड़ा गंभीर होते हुए, कुछ सोचते हुए कहते हैं - राजेश जी, रांगेय राघव मेरे बी.ए. के सहपाठी थे। बहुत प्यारा था व्यक्तित्व। बड़ा खुशमिजाज था। मैं गंभीर तथा शांत रहता था वे मुझसे कहा करते थे बाद में सिगरेट बहुत पीते थे। लेखन ही उनकी जीविका का साधन था।

इसी क्रम में वे प्रभाकर माचवे का जिक्र करते हैं -
प्रभाकर माचवे से दिल्ली में भेंट हुई। मुझे बहुत अच्छे लगे माचवे। इन्होंनें साहित्य अकादमी दिल्ली में मुझे घुमाया। नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल से मिलाया।
(अपनी पत्नी से बनवा कर मुझे कॉफी पिलाई। ये साहित्य अकादमी के सेक्रेटरी थे। साहित्य अकादमी परिचयात्मक च्ङ्खध्दशह्य ङ्खध्दश निकालती थी। काफी समय तक इसमें मेरे नाम का बराबर उल्लेख होता रहा।)

अब डॉ. सिसौदिया जी ने शिवमंगल सिंह सुमन के बारे में बताते हैं -

सुमन जी मैनपुरी आए थे - राहुल सांकृत्यायन जन्म शताब्दी में। यहाँ मेरी उनसे भेंट हुई। सुमन जी का अच्छा स्वभाव था। वे अच्छा भाषण देते थे।

इसके पश्चात मैंने सिसौदिया जी से पूछा - डॉक्टर साहब 1943 ई. के च्तार सप्तक के प्रकाशन के बाद अज्ञेय एक नायक के रूप में सामने आते हैं। क्या तथाकथित प्रयोगवाद ने प्रगतिशील हिंदी-कविता को क्षति पहुँचाई है ?

डॉ. सिसौदिया - कुछ समय तक अज्ञेय के व्यक्तित्व ने प्रगतिशील हिंदी-कविता को आच्छादित किया। थोड़े समय तक क्षति भी हुई। लेकिन बाद में हिंदी-कविता इससे उबर गई।

राजेश कुमार - कुछ पुराने कम्युस्टिों ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की निन्दा की है। मेरे विचार से नेताजी की देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता। नेताजी के बारे में आपकी क्या अवधारणा है ?

डॉ. सिसौदिया - मैंने 1939 में नेताजी का फारवर्ड ब्लॉक ज्वाइन किया। मैं इटावा में उपाध्यक्ष भी था। इटावा रेल्वे स्टेशन पर मैं उनसे मिला। वे दिल्ली से इलाहाबाद जा रहे थे। वे बहुत आशावादी थे। नेताजी अग्रगामी दल को मजबूत करने पर बल दे रहे थे। उन्होंने कहा - हम अंग्रोों को तबाह कर देंगे। उनका च्तबाह शब्द मुझे आज भी याद है। नेताजी सोवियत संघ से ही मदद लेना चाहते थे। लेकिन विश्व की तत्कालीन परिस्थितियों के कारण उन्हें जापान-जर्मनी का आश्रय लेना पड़ा। तब से मैं विचारों में अंतर मानने लगा। वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई। वे एटा में रिजोर रियासत में साढे तीन वर्ष संन्यासी के रूप में रहे। वह कई भाषाएं जानते थे, अंग्रोी बहुत अच्छी बोलते थे। वह 30-40 बाल्टियों से नहाते थे। शॉलमारी आश्रम इन्होंने स्थापित किया। जब मैं यहां आया, वे रिजोर से जा चुके थे। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभिसीतारमैया को गांधी जी ने खड़ा किया। बोस स्वयं खड़े हुए। बोस जीते।

गांधी ने स्वयं स्वीकार किया कि यह उनकी हार है। बाद में बोस ने स्वयं इस्तीफा दे दिया। गांधी जी के प्रति उन के मन आदर-भाव तो था, लेकिन वे उनकी नीतियों में विश्वास नहीं रखते थे। समाजवादी विचारधारा नेहरू की ज्यादा थी। विचारधारा में सुभाष नंबर दो पर थे। लेकिन राष्ट्र के प्रति मर मिटने का भाव सुभाष में सबसे ज्यादा था। उन दिनों सुभाष की लोकप्रियता शिखर पर थी। गांधी, नेहरू सुभाष से पीछे थे लोकप्रियता में। उस समय की नीतियों के कारण नेताजी ने स्वयं को गुप्त रखा।

राजेश कुमार - अभी हाल ही में वन्दे मातरम् के गायन को ले कर देश में उठा-पटक हुई है। आप भारतवासियों को इस संबंध में क्या कहेंगे?

डॉ. सिसौदिया - इसको ले कर दोनों वर्गों को समझदारी से काम लेना चाहिए। इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ को अतिवादिता की हद तक खींचने की कोशिश की गई है। मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है। मैंने हिंदू-मुसलमान में कोई भेद नहीं रखा है।

(मेरे आग्रह पर सिसौदिया जी ने फोटो खिंचवाए हैं। अब मैंने सिसौदिया जी से अपने चलने की बात कही है। वे मकरे से बाहर आते हैं। मैं उनके चरण छूता हूँ। वे आशीर्वाद की मुद्रा में कुछ कहते हैं। एक प्रगतिशीलकवि तथा स्वतंत्रता-सेनानी के व्यक्तित्व से अभिभूत हो कर मैं अपने घर लौटता हूँ।)