मोहक क्षण जी लें

डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा

आओ रानी रसघट पी लें
फिर से कुछ मोहक क्षण जी लें
खर्च कटौती आपाधापी
छोड़ो सब खटराग पुराना
हल्दी, तेल, खटाई, दलहन
आसपास संबंध निभाना
चढ़ा गैस पर दूध न उबले
कपड़ा गरम न कीड़े घाएं
थोड़ी देर पास आ बैठो
छोड़ो ये सारी चिन्ताएँ

इस कोल्हू में जुते बैल हम
कुछ क्षण अपने कंधे ढीलें

कागज कलम, दवात पोथियाँ
लेख, अधूरी लिखी कहानी
मैने उधर उठाकर रख दी
कविता की कापियाँ पुरानी
अलग-अलग दुनिया में हम तुम
रमे हुए थे ऑंखें मींचे
घर था एक एक ही छत थी
रहते थे हम जिसके नीचे

थका पसीना दौड़ा हांफा
चुभती रही पांव में कीलें

चेहरे को सलवटें सौंप दीं
केशों ने पी कर उजलापन
दर्द उभर आया घुटनों में
होने लगी दाँत में टीसन
चमक जागने लगी रीढ़ में
कन्धे कमर विनम्र हो गए
मधुवन गन्ध चाँदी बाले
सपने जाने कहाँ खो गए

आओ पढ़ें पुराने पन्ने,
फिर अतीत की परतें छीलें
गाती मोर, महकती शामें
नदिया का तट गुथीं उंगलियां
दिन के सपने जागी रातें
छुअन देह में भरी बिजलियां
गजरे वाले गन्ध गुलाबी
थकी सेज की शिकन सुहानी
मान मनौवल परिकथाएं
वह संक्रामक हंसी अंजानी

बैठो चलो नाम के नीचे
खोले सब यादों की रीलें