रायपुर के हबीब तनवीर

खामोश हुए रंगमंच के फनकार

रायपुर की साँस और छत्तीसगढ़ की धड़कन हबीब साहब के दिल में बसती थी। अपने शहर रायपुर से भले ही दूर रहे हों, लेकिन इसकी याद हमेशा उनके साथ होती थी। परिवार की खैरियत हो या सहकर्मियों की चिंता, हबीब साहब कायम रखे हुए थे। अपनी जन्म भूमि से बेइंतहा मोहब्बत के साथ शहर में खेले गए नाटकों के मंच को भी वे पूरी शिद्दत से प्यार करते थे।

अपनी राजधानी के इस लाड़ले और प्रतिभाशाली कलाकार की दुनिया से विदाई पर पूरा शहर मानो गुमसुम सा हो गया है। घर में एलबम देखकर उनकी यादों को संजोते रिश्तेदार हो या उनके मार्गदर्शन में काम किए हुए कलाकार, सभी के जेहन में हबीब साहब की यादें ताजा रहेंगी।

रंगमंच के इस मुकम्मल फनकार के रग-रग में रायपुर बसता था। यही कारण है कि दूर जाकर भी अपने शहर से उनकी मोहब्बत हमेशा बरकरार रही। खास होकर भी आम होने की उनकी अदा के सभी कायल थे। उनके हुनर का जादू था कि रंगमंदिर से लेकर साइंस कॉलेज में उनके खेले गए नाटक दर्शकों के दिल में बस गए।

रायपुर से प्यार

हबीब साहब की जन्मभूमि होने के कारण उन्हें छत्तीसगढ़ से गहरा लगाव तो था ही, साथ ही वे रायपुर को भी काफी पसंद करते थे। वर्तमान में छत्तीसगढ़ प्रदेश की राजधानी रायपुर के छोटापारा में उनका पुश्तैनी मकान है। अपने नाटक के माध्यम से प्रदेश की लोककला को पूरी दुनिया से रू-ब-रू कराने वाले हबीब साहब योग और मेहनत में यकीन रखते थे। ताउम्र थिएटर को अपना घर और थिएटर से जुड़े कलाकारों को अपने परिवार का सदस्य समझने वाले हबीब साहब की कामयाबी के ताज में उपलब्धियों के एक से बढ़कर एक नगीने जड़े हुए थे।

खाने के शौकीन

हबीब साहब की भंजी नसरीन खान ने बताया कि वे आखिरी बार जनवरी में रायपुर आए थे। उन्हें खाने में दूध और जलेबी बहुत पसंद थी। सेम, रखिया बड़ी, बैंगन का भुर्ता और लाल भाजी वे बड़े चाव से खाते थे। आखिरी बार लिखे अपने खत में उन्होंने टेंगना मछली खाने की फरमाइश की थी। वे बताती हैं कि जब भी वे आते देर रात तक अपने काम में मशगूल रहा करते थे।

आत्मकथा लिख रहे थे

उनके नाती शकील परवेज ने बताया कि इन दिनों नाना (हबीब तनवीर) आत्मकथा लिख रहे थे। आखिरी बार जनवरी में जब वे उनके घर दुर्ग आए थे, तब परिवार के हर सदस्य के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाई थी। आत्मकथा में परिवार के सभी सदस्यों का उल्लेख करना चाह रहे थे।

वक्त के पाबंद

रायपुर में इप्टा के संयोजक सुभाष मिश्रा ने बताया कि वर्ष 2003 में किए गए उनके नागरिक अभिनंदन पर, उन्होंने कहा था कि 'मुझे मालूम नहीं, मेरे शहर के लोग मुझसे इतना प्यार करते है।' स्टेशन में ट्रेन से रवाना होने से पहले पहुँचने में देर होने पर डाँटते हुए कहा था कि तुम लोग समय पर स्टेशन नहीं पहुँच पाते, थिएटर कैसे करते होगे? उनसे जो कुछ भी सीखने मिला अनमोल है।
रमन-बृजमोहन की ओर से पुष्पचक्र समर्पित

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के प्रतिनिधि के रूप में संस्कृति विभाग के संचालक राजीव श्रीवास्तव ने रंगकर्मी हबीब तनवीर के पार्थिव काया पर पुष्पचक्र चढ़ाया। श्री श्रीवास्तव राय शासन की ओर से प्रतिनिधि के रूप में भोपाल भेजे गए हैं। उन्होंने श्री तवीर के परिजनों से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी।

एक अध्याय का अंत

पूरी दुनिया में अपने गुण-धर्म को रंगमंच को नया मुहारवा देने वाले पद्मभूषण हबीब तनवीर का निधन बिरादरी व आमजन की नजर में एक अध्याय का अंत है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तनवीर के निधन पर जारी शोक संदेश में कहा है कि उनके निधन से हिंदी और छत्तीसगढ़ी रंगमंच के एक अत्यंत सुनहरे युग का अंत हो गया।

संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू ने पद्मभूषण से सम्मानित सुप्रसिध्द रंगकर्मी एवं नाटय निर्देशक श्री तनवीर के निधन पर गहन शोक व्यक्त करते हुए कहा कि श्री तनवीर ने छत्तीसगढ़ की समृध्द कला को रंगमंच के माध्यम से विश्व मेंख्याति दिलाई। गर्व की बात है कि श्री तनवीर रायपुर के निवासी थे।

अजीत जोगी ने कहा है कि वे छत्तीसगढ़ के गौरव थे। उनसे अपने व्यक्तिगत संबंधों का स्मरण करते हुए श्री जोगी ने कहा कि उनके निधन से हुए नुकसान को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ बनने पर छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने उन्हें सम्मानित किया था। छत्तीसगढ की पहली सरकार ने पद्मविभूषण के लिए उनके नाम की अनुशंसा की थी।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष एवं सांसद मोतीलाल वोरा ने कहा कि श्री तनवीर ने छत्तीसगढ़ की परंपरा, साहित्य एवं संस्कृति के उत्थान के लिए जो किया भुलाया नहीं जा सकता।

छग प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता इकबाल अहमद रिजवी ने कहा है कि उनके निधन से रिक्त स्थान की भरपाई असंभव है। बाल्यकाल से ही मरहूम तनवीर के सानिध्य में छग लोक गायन से जुड़े रिजवी ने कहा है कि मरहूम तनवीर ने अपनी जन्मभूमि तथा छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति एवं लोक गायन को विख्यात करने में कसर नहीं छोड़ी।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू, कार्यकारी अध्यक्षद्वय डॉ. चरणदास महंत एवं सत्यनारायण शर्मा, पूर्व मंत्री भूपेश बघेल, मीडिया प्रमुख रमेश वर्ल्यानी, महामंत्री सुभाष शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता हसन खान ने कहा कि श्री तनवीर छत्तीसगढ़ी लोक भाषा तथा लोक नाटय को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर ख्याति दिलाने वाले रंगकर्मी रहे। श्री तनवीर ने छत्तीसगढ़ी साहित्य, संस्कृति, भाषा एवं लोक संगीत के उत्थान के लिए बहुत कार्य किया।

पद्मश्री हबीब तनवीर के दुखद निधन पर पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय परिवार ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए आत्मा की शांति तथा उनके परिवार को इस गहरे आघात को सहन करने की शक्ति प्रदान करने हेतु ईश्वर से प्रार्थना की है।

तनवीर ने अपनी कला व हुनर का लोहा अंतरारष्ट्रीय स्तर पर मनवाया

प्रसिध्द रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन पर संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व के अधिकारियों तथा कर्मचारियों ने शोक सभा कर भावभीनी श्रध्दांजलि अर्पित की। इस अवसर पर संस्कृति आयुक्त श्री राजीव श्रीवास्तव ने हाल ही में श्री तनवीर से हुई मुलाकात का संस्मरण सुनाया और कहा कि तनवीर महान नाटककार थे एवं छत्तीसगढ़ी लोक कला के संरक्षण, संवर्धन में उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। शोक सभा में संस्कृति विभाग के एस.बी. सतपाल, डॉ. तपेश गुप्ता, एस.एस.सी. केरकेट्टा, जे.आर. भगत, उमेश मिश्रा, राकेश तिवारी, एन.के. लालवानी, प्रताप पारख, देवेश साह सहित अनेक अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित थे।

छत्तीसगढ़ रंग मंडल ने कहा कि उनके निधन से भारतीय रंगजगत के एक अध्याय की समाप्ति हो गई। रंग मंडल के अध्यक्ष योगेश अग्रवाल, महासचिव डॉ. कुंजबिहारी शर्मा, सह सचिव संजय मैथिल ने उनको याद करते हुए उनकी संपदा को संरक्षित करने की मांग की है। जलील रिजवी, शेखर शुक्ला ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए उनका स्मरण किया।

प्रेस क्लब में शोकसभा

छत्तीसगढ़ के रंगकर्मियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाले प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन से रंगकर्म जगत में शोक की लहर फैल गई। छत्तीसगढ़ के रंगकर्मियों ने हबीब तनवीर के साथ बिताए गए पल का स्मरण करते हुए श्रध्दांजलि अर्पित की। रायपुर की सभी रंग संस्था और प्रेस क्लब की ओर से शोक सभा रखी गई।

निरक्षर को बनाया पद्मश्री का हकदार
गोविन्दराम निर्मलकर

छत्तीसगढ़ के प्रसिध्द रंगकर्मी हबीब तनवीर का स्मरण करते हुए पद्मश्री गोविन्दराम निर्मलकर कहते हैं कि उन्होंने मुझ जैसे निरक्षर को पद्मश्री का हकदार बनाया। चालीस वर्ष मैंने उनके साथ बिताए। नाचा करते हुए 1959-60 में हबीब तनवीर से मुलाकात हुई। उसके बाद लाल मिर्जा, शोहरत, रुस्तम नाटक खेलते हुए विदेश गए। उन्हीं की वजह से मैंने चरनदास चोर जैसे नाटक में केन्द्रीय भूमिका निभाई।

छत्तीसगढ़ की मिट्टी की गंध बनी

राजकमल नायक

'कौतुक' नाटय संस्था के संयोजक व वरिष्ठ रंगकर्मी राजकमल नायक का मानना है कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी की गंध हबीब तनवीर के नाटकों का एक अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी। दुनिया भर में छत्तीसगढ़ के ग्राम्य जीवन, संस्कृति और ज् ामीन से जुड़े कलाकारों को लेकर उन्होंने जो प्रयोग किया वो सफलरहा। इसके अलावा उर्दू की नज् म, शेरो-सायरी, ंगज् ाल का खूबसूरत उपयोग उन्होंने अपने नाटकों में किया।

हबीब तनवीर एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने बहुत सारे मोर्चों पर काम किया। एक सफल निर्देशक के अलावा अभिनय, गायकी, नाटय लेखन, ड्रामा वर्कशाप का संचालन बखूबी किया। बोली को उन्होंने समकालीन बनाया। आज जबकि भाषाएं प्रभावित हो रही हैं, तब बोली को रंगमंच के जरिए तनवीर साहब ने सुरक्षित रखा। उनकी एक खासियत जो मैंने महसूस कि वो ये थी कि आशिक्षित कलाकारों को उन्होंने बोलकर कई बार एक-एक दृश्य बताए। उनके नाटकों की सहजता बहुत बड़ा गुण था।

रंगमंच की महान हस्ती
एम. के. रैना

उन्होंने बब कारंत और के एन पणिक्कर की तरह भारीतय रंगमंच को नया सुर प्रदान किया । रंगमंच के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय है । श्री तनवीर भारतीय रंगमंच की महान हस्ती थे । वह जीवन भर दक्षिण पंथी ताकतों से लड़ते रहे । हिन्दुत्ववादी ताकतों ने उन्हें काफी परेशान भी किया लेकिन वह झुके नहीं । उन्होंने रंगमंच को परंपरा एवं आधुनिकता के मेल का स्वरूप प्रदान किया । उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को ब्रिटेन एवं यूरोप के मंच पर पेश कर दुनिया को भारतीय रंगमंच से अवगत कराया ।

अंदाजे हबीब क्या कहना

संतोष जैन

रंगकर्मी संतोष जैन कहते हैं कि अंदाजे हबीब क्या कहना। उन्होंने आम आदमी की बात को बड़े ही सशक्त माध्यम से पेश किया। खास बात ये रही कि झुग्गी में रहने वाले, ग्रामीणों, आदिवासियों और आम लोगों के साथ वो ऐसे नाटक तैयार किया करते जिनके आगे प्रोफेशनल कलाकार बौने लगते हैं। 1954 में दिल्ली के प्रथम व्यावसायिक थिएटर कंपनी हिंदुस्तानी थिएटर की स्थापना की। और पाँच वर्ष बाद अपने स्वयं का नया थिएटर तैयार किया।

रंगकर्मी योगेन्द्र चौबे, प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रो. रमाकांत, महासचिव प्रभाकर चौबे, इप्टा के अध्यक्ष मधुकर, महासचिव राजेश श्रीवास्तव, श्रीमती नीलू मेघ, जयप्रकाश मसंद, त्रिलोकचंद चिमनानी, आनंद टेकवानी ने हबीब तनवीर के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए श्रध्दांजलि दी।

समर्पित कलाकार थे हबीब तनवीर

डॉ. सत्यभामा आडिल

हबीब तनवीर के निधन पर श्रध्दांजलि अर्पित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सत्यभामा आडिल ने कहा कि भारतीय नाटय कला एवं रंगमंचीय परिदृश्य में विशिष्ट पहचान बनाने वाले लोक मर्मज्ञ हबीब तनवीर का हमारे बीच से चले जाना एक अपूरणीय क्षति है। सन् 1976 में भिलाई लोक कला महोत्सव के प्रथम वर्ष में लोककला पर होने वाले परिसंवाद में हम साथ-साथ थे। वह एक अविस्मरणीय घटना थी। जब मेरे एक ओर स्व. रामचन्द्र देशमुख और दूसरी ओर स्व. हबीब तनवीर बैठे थे। लोकमंच के दो दृढ़ स्तंभ प्रतिस्पर्धी अपने-अपने स्वाभिमान से तने अपनी-अपनी बातें रख रहे थे। 2008 में पूरी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने मेरी शोध छात्रा कल्पना मिश्र को भोपाल में पूरे दो दिन का समय दिया और रात्रि अपने नाटय प्रदर्शन मेें अपने साथ बैठाए रखकर रंगमंचीय दिशा-निर्देश देते रहे। दूसरे दिन अपनी टीम के साथ फ्रांस रवाना हुए। बराबर मुझे स्मरण करते रहे। कला के प्रति उनका समर्पण, रंगमंचीय अनुशासन एक नया आयाम बन गया। हमें गर्व है कि वे छत्तीसगढ़ में रायपुर की माटी से जुड़े थे।

आगरा बाजार

आगरा बाजार हबीब तनवीर का लिखा नाटक है जिसका पहला सो हुआ था 1954 में, पर रवानी और लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने की क्षमता आज 54 बरस बाद भी इस नाटक में मिलती है। सामाजिक वर्जनाओं में फं्सा उलझा सामाजिक ताना बाना नजर आता है। आगरा बाजार में यह नाटक 19वीं सदी में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 1857 के विद्रोह को देख चुके हिंदुस्तान के एक शहर आगरा की तस्वीर खींचता है जिसमें समाज, बाजार, संस्कृति, सोच और सलीके...सब कुछ बदल रहे हैं। एक ओर मुगल परंपरा की ओढ़ी-ढंकी चादर और नज्कत की सूखती ऑंखें हैं तो दूसरी ओर है नज् ाीर अकबराबादी की गज्लों में बसता आम आदमी, रुढ़ियों-वर्जनाओं से उठते, बाहर निकलते शायर का शहर, आगरे के इस बाजार में दुकानदारों के बीच लाचारी, बेबसी है क्योंकि खरीदार नदारद हैं। खरीदार जो हो सकते थे, उनके पास काम नहीं है। बेरोज् ागारी और लाचारी के चेहरे ओढ़े लोग वक्त काट रहे हैं। इस आस में कि कभी माहौल सुधरेगा॥ शायर और उसके कुछेक चाहने वाले अपनी सोच, मिजाज् ा और सामाजिक जुड़ाव से इन कठिनाइयों में भी एक शहर और इस बहाने एक संस्कृति, सामाजिकता को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं।

प्रशासनिक कुव्यवस्था, तवायफों के कोठे, घूसखोर कोतवाल, बदअक्ल सिपाही, बाजार में अखबार और किताबों से कमाई और नाम खोजते लोगों का ठिकाना है यह आगरा बाजार।

अंदाजे हबीब

नाटकों की खास बात यह रही है कि झुग्गियों में रहने वालों, ग्रामीणों, आदिवासियों और आम लोगों के साथ वो ऐसे नाटक तैयार करते हैं जिनके आगे प्रोफेशनल कलाकार बौने नजर आने लगते हैं। हबीब तनवीर रंगमंच मे्ं अपने प्रयोगों और जमीनी कलेवर के लिए जाने जाते रहे हैं। इन नाटकों में इन आम लोगों के जरिए आमजन के सवाल दर्शकों के सामने आते हैं। अकादमिक काम के बजाय लोगों के बीच काम करते रहे। हबीब प्रगतिशील नाटय समूह इप्टा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे। दिल्ली में आगरा बाजार के मंचन के बाद कुछ पत्रकारों ने रंगमंच के हालात पर जब उनसे सवाल किया तो हबीब बहुत तसल्ली से बोले, आप फिक्र न करें। थिएटर खत्म नहीं होने वाला, वो तो खूब हो रहा है। आप देखना कम चाहते हैं। आज पहले से यादा नाटक हो रहे हैं। हबीब कहते हैं, जब सिनेमा आया था तो लोगों को लगा कि अब थिएटर मर जाएगा।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष एवं सांसद मोतीलाल वोरा ने सुप्रसिध्द रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन पर श्रध्दांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि श्री तनवीर ने छत्तीसगढ़ी परम्परा, भाषा-गीत, साहित्य एवं संस्कृति के उत्थान के लिए अच्छा कार्य किया जिसे कभी भुलाया नही जा सकता। श्री वोरा ने माटीपुत्रों के परिवारजनों को अपनी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की है कि उन्हें इस दु:ख को बर्दाश्त करने की शक्ति प्रदान करें।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, रविन्द्र चौबे ने छत्तीसगढ क़े जाने-माने नाटककार, कथाकार हबीब तनवीर के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि श्री तनवीर ने अपने कला एवं हुनर से अपनी प्रतिभा का लोहा अंतर्राष्ट्रीय स्तर में मनवाया। श्री तनवीर को कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है। उनके नाटकों का मंचन पूरे विश्व में होता रहा है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि श्री तनवीर का निधन कला जगत के साथ-साथ राष्ट्र के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है। उनकी स्मृतियां राष्ट्रीय धरोहर के रूप में हमारे बीच सदैव जीवंत रहेंगी। संपादकीय

रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन से प्रदेश के लोक कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की अपूरणीय क्षति बताया

नांदगांव से रहा गहरा नाता

जाने माने रंगकर्मी हबीब तनवीर का नांदगांव जिले के लोककलाकारों से गहरा नाता रहा है। यहां के कई लोककलाकारों को उन्हाेंने न सिर्फ पहचान दी, बल्कि विश्वस्तर के थियेटर में कार्य करने का मौका भी दिया। श्री तनवीर के निधन की खबर से लोककला जगत में शोक की लहर व्याप्त हो गई है कलाप्रेमियों ने इसे अपूरणीय क्षति माना है। वहीं थियेटर की दुनिया का एक अध्याय का समापन निरूपित किया है। थियेटर की दुनिया के बेताज बादशाह हबीब तनवीर ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने जिले के लोककला मंच से जुड़े दर्जनभर कलाकारों को एक नया मुकाम दिया। जिले की मिट्टी की महक को विश्वस्तर के थियेटरों में बिखेर कर लोक संस्कृति एंव परम्परा को प्रसारित करने में पूरा जीवन लगा दिया। जिले में पद्मश्री से नवाजे गए गोविंद निर्मलकर, मदन निषाद, रवि उदयराम निषाद, दीपक विराट, पूनम विराट, सुनेरी, देवीलाल नाग, विक्रम यादव, रामशरण वैष्णव, लता खापडर्े सहित ऐसे कई लोककला साधक है, जिनका परिचय श्री हबीब से रहा है। लोककला मंच से जुड़े रामशरण वैष्णव एवं लता खापडर्े ने चर्चा के दौरान बताया कि वर्ष 1999 से वे श्री तनवीर से जुड़े और उनके मार्गदर्शन व संरक्षण में कार्य करने का मौका मिला। वर्ष 2001 में जर्मनी, रूस तक कार्यक्रमों की प्रस्तुति देने पहुंचे और अब तक उनके साथ जुड़े रहे। कला जीवन को समर्पित उक्त फनकारो ने बताया कि श्री तनवीर रिहर्सल को काफी महत्व दिया करते थे। वे खुश मिजाज व्यक्तित्व के थे काम को लेकर कभी डांटते तो कभी दुलार करते थे। लता खापडर्े ने बताया कि श्री तनवीर लोककलाकारों की भावनाओं को बेहतर समझते थे। वे रिहर्सल को इतना महत्व देते थे कि कार्यक्रम के समय दर्शक बैठ जाते थे। इसके बावजूद रिहर्सल जारी रहता था। वे हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, उर्दू एंव बंगाली भाषा के भी जानकार थे। उन्होंने 16 मई 2009 को दिल्ली में उनके साथ अंतिम कार्यक्रम दिया था। आगामी वर्षो में जर्मनी फ्र ांस, व अन्य देशो के थियेटर में कार्यक्रम देने की भी तैयारी थी। ऐसा सम्भवत: कोई ड्रामा नहीं था जिसमें छत्तीसगढ़ी लोकगीत न हो। लोककला मंच से जुड़े लोगो ने कहा कि श्री तनवीर का निधन लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। (हरिभूमि)

दुर्ग जिले के कलाकारों का जमावाड़ा रहा नया थियेटर

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी दुर्ग जिले से हबीब तनवीर का नाता कुछ इस तरह रहा कि वे यहां के रंगकर्मियों में नकारात्मक उर्जा का संचार करते रहें। आंचलिक रंगमंच के पुरोधा स्वर्गीय दाऊ रामचन्द्र देशमुख और स्वर्गीय दाऊ महासिंग चन्द्राकर जैसी हस्तियों के बीच हबीब तनवीर का उठना बैठना जरूर रहा, लेकिन वैचारिक तौर पर उनसे कभी भी उनका समन्वय नहीं हो पाया। थियेटर और हबीब का भी एक बार सीधा नाता दुर्ग शहर से रहा है। जानकार बताते हैं कि वर्षो पहले हबीब ने शासकीय बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मैदान में बहादुर कलारिन नाटक का मंचन किया था। यह अलग बात है कि दर्शक जुटाने के लिहाज से यह मंचन बुरी तरह पिट गया था। स्वर्गीय रामचन्द्र देशमुख से जुड़े लोग बताते हैं कि दाऊजी की अंचल के गावों में तलाशी गई प्रतिभाओं को सकेल कर दिल्ली ले जाने संबंधी संदर्भ ने ही सबसे पहले हबीब - रामचन्द्र को विपरीत ध्रुव बना दिया था। वैसे भी स्वर्गीयतनवीर के नया थियेटर में जुड़े अधिकांश छत्तीसगढ़ी कलाकार अविभाजित दुर्ग (राजनांदगांव) जिले की जमीन में जन्में और कला सीखे हुये लोग थे । दुर्ग विकासखंड के अछोटी और हनोदा जैसे गांवों से लेकर नामों की बात करें तो नामी गम्मतिहा मदन निषाद, लालू, भुलवा, गोविंद निर्मलकर जैसे जन्मजात कलाकारों को हबीब लोककला के दुर्ग से ही उठाकर दिल्ली तक ले गए थे। इनमें से अनेक कलाकारों की गांव से बाहर नई शुरूआत स्वर्गीय देशमुख के सरग-नरक, छग से पलायन कर बिहार में नारकीय जिंदगी जी रहे लोगाें पर आधारित नाटक कालीमाटी आदि से हुई थी। दोनों के बीच लगातार चला द्वंद कई बार लोगों के सामने भी आया। ऐसा ही एक वाक्या 1981-82 के दौर में उस समय का है, जब लोरिक चन्दा नाटक तैयार होने के बाद स्वर्गीय दाऊ महासिंग चन्द्राकर की इस प्रस्तुति की समीक्षा के लिए हबीब तनवीर और रामचन्द्र देशमुख दोनों ही आमंत्रित थे। हबीब जहां जीवन भर उंगलियों में सिगार थामे रहे, वहीं स्वर्गीय देशमुख पनामा सिगरेट के शौकीन थे। अंचल के वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्ण कुमार चौबे की नजरों में हबीब बेशक थियेटर के मायनों मे नजर रखने वाले निर्देशक थे। वहीं श्री चौबे यह भी जोड़ते हैं कि उनके साथ दिल्ली और विदेशों तक का सफर करने वाले मौलिक और जन्मजात कलाकारों का भविष्य और तकदीर मृत्यु पर्यन्त नहीं बदल पाया।

एक पहलू ऐसा भी

हबीब तनवीर रंगमंच के शीर्ष निदेशक, लेखक, संगीतकार, गायक तथा अभिनेता थे यह हम सब जानते हैं, पर यह कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने अपने नाटकों के गीत भी स्वंय लिखें थे। ''ल भीतर एक बृच्छा'' के संचयन के दरम्यान जब एक बार दिल्ली के सुदीप बनर्जी से मेरी भेंट हुई तो उन्होंने मुझसे पूछा कि इस संचयन में मैने हबीब तनवीर के लिखे हुए गीतों को सम्मिलित किया है या नहीं मैंने जब इस विषय में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की तो सुदीप जी ने हबीब तनवीर के इस पक्ष पर भी मेरा ध्यान आकृष्ट किया। दिल्ली से वापस लौटकर मैने सुदीप बनर्जी की बातों का उल्लेख करते हुए हबीब तनवीर को भोपाल के पते पर पत्र लिखा तथा मैंने उनसे रचनाएं भेजने के लिए अनुरोध किया आठ दस दिनों बाद मुझे हबीब तनवीर का भारी भरकम लिफाफा मिला जिसमें उन्होंने मुझे अपने लिखे हुए 25-30 गीत भेजे थे। मैंने उनमें से तीन गीतों को (मानुष तन बौराना, दुश्मन तथा एक गीत) इस संचयन में सम्मिलित किया। इस तरह मैं हबीब तनवीर के इस काव्यात्मक पक्ष को सामने ला सका, जिसके अभाव में यह संचयन शायद अधूरा प्रतीत होता है। 

खुशमिजाज हबीब

तनवीर जी का वर्कशाप जब रविशंकर विश्वविद्यालय में लगाया गया, तब वे इसके प्रभारी थे। हबीब साहब के साथ करीब दो माह तक इस वर्कशाप के छात्रों ने महाभारत के प्रसंग पर आधारित नाटक उरूभंगम तैयार किया था तनवीर जी जिस तरह अभिनय की बारीकियां बताते उससे छात्रों को सीखने में आसानी हुई। कम साधनों में बेहतर प्रोडक्शन का फार्मूला भी उन्होंने बताया। छात्रों की झिझक दूर करने वे सभी कलाकारों को यूनिवर्सिटी से रंगमंदिर तक ड्रेसअप कर ले गए। उनकी खुशमिजाजी, कठोरता के साथ कुछ आत्मकेंद्रित स्वभाव को मैने करीब से जाना इसी तरह मराठी नाटकों के प्रति भी उनका विशेष लगाव था। राम गणेश गड़कारी का लिखा नाटक एकच प्याला के हिंदी अनुवाद की उन्होंने पूछताछ भी की थी ।

समझौता कभी नहीं

हबीब साहब का गुजरना, मानो रंगमंच के युग का खत्म होना है जितने भी छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने राष्ट्रीय ख्याति पाई, फिर वह चाहे तीजनबाई हो, गोविंदराम या पूनाराम सभी हबीब साहब की वजह से प्रसिध्द हुए वे खुद हबीब साहब से बेहद प्रभावित हैं। बिना किसी अतिरिक्त तामझाम के सहज रूप से नाटक लिखने, निर्देशित करने के अलावा ड्रामा मैनेजमेंट की बारीकियों को उन्होंने बखूबी समझा था। यह उनकी प्रशासनिक क्षमताओं के अलावा सख्त अनुशासन के कारण संभव हुआ। नाटक उनकी सांसों में बसा था जिद इतनी की अपने विचारों या प्रोडक्शन की क्वालिटी से कोई समझौता वे नहीं करते। रायपुर के प्रति उनका खास लगाव रहा यहां के रंगकर्मियों की वे बराबर पूछपरख करते। वे एकमात्र ऐसे रंगकर्मी है जिन्हें यूनिवर्सल कहा जा सकता है, उनके नाटक छत्तीसगढ़ के अलावा दिल्ली, लंदन सभी स्थानों पर समान रूप से सराहे गए इसी तरह साहित्यकारों में भी उनकी विशेष थी।