मेरी रंग यात्रा लंबी है इस यात्रा में क्या खोया, क्या पाया इस मूल्यांकन की न यह जगह है और न शायद यह मेरा काम। बस इतना जानता हूं कि सबसे पहले मुझे शायरी में दिलचस्पी पैदा हुई और पहले मैं शायर की ही हैसियत से सामने आया, फिर जब मैं ड्रामे के मैदान में उतरा तो शायरी का असर मेरे लेखों पर छाया था, शतरंज के मोहरे मेरा पहला कामयाब नाटक है जिसके न सिर्फ संवाद में शायरी का यह असर साफ झलकता है बल्कि नाटक के आखिर में इन्शा की वो मशहूर गाल भी गायी जाती है।
चूंकि मुझे गाने का भी शौक था। मैं अपनी गालें मुशायरों में तरन्नुम से सुनाया करता था इसलिए शतरंज के मोहरे में इन्शा की गाल मैं खुद गाया करता था यह जमाना मेरी बम्बई की जिन्दगी से संबंधित है। फिर जब मैं 1954 में देहली आया तो आगरा बाजार के बहाने नज़ीर अकबराबादी का कलाम मेरे हाथ आया। इस नाटक से मैंने अपने दोनों शौक पूरे किये। नजीर की गज़लों और नमों का भी।
उस वक्त तक न तो मैं संस्कृत नाटकों से परिचित था और न हिन्दुस्तान की लोक थियेटर शैलियों से। महज इप्टा से जुड़े रहने के नाते मराठी और गुजराती लोक नाटय शैलियों की मुझे सुध थी। छत्तीसगढ़ी लोक गीत तो मैं बचपन से गाया करता था ।
इस जमाने में मैंने संस्कृत के मुख्य नाटक पढ़ने शुरू किये और उनका गहरा असर कुबुल किया, तीन साल 1955 से 1958 तक मैं बाहर रहा, इस जमाने मैं मैंने पहली बार ब्रेश्त के नाटकों की अध्ययन भी किया और बर्लिन में उनकी बहुत सी प्रस्तुतियां भी देखीं। इनमें भी मैंने कविता और संगीत का पक्ष देखा और उससे प्रभावित हुआ।
1958 में हिन्दुस्तान वापस आने के बाद मैं छत्तीसगढ़ी नाचा से पहली बार परिचित हुआ। बस मैं छह छत्तीसगढ़ी कलाकारों को अपने साथ लेकर देहली आ गया और उन्हें अपनी प्रस्तुति 'मिट्टी की गाड़ी्' में शामिल कर लिया। गाने नियाज हैदर से लिखवाये, लेकिन धुनें नहीं, लेकिन यादातर छत्तीसगढ़ की इस्तेमाल की और अक्सर गाने लोक कलाकारों से गवाये। उनकी बुलंद आवाजों और मधुर कण्ठ ने तो इन गानों में चार चांद लगा दिये लेकिन हिन्दी का संवाद अनपढ़ ग्रामीणों की जबान से कुछ अच्छा नहीं लगा, मातृभाषा में जो अपनी एक शक्ति और हमारी बोलियों में जो अपनी एक मिठास होती है उसे पहचानने में मुझे देर लगी। इसके लिए मुझे 1970 तक इंतजार करना पड़ा। जबकि मैंने छत्तीसगढ़ी लोक नाटक छत्तीसगढ़ी कलाकारों से उन्हीं की बोलीे में पेश करने शुरू किये लेकिन दर्शक नदारद। इस तरह तीन साल गुजर गये इस समस्या का समाधान 1973 में मिला।
'गांव के नाव ससुराल मोर नाव दामाद' 1973 की रायपुर नाचा वर्क शाप का नतीजा है जिसने देहली पहुंच कर पहली बार वो कामयाबी हासिल की जिसके कारण यह नाटक अभी तक जीवित है। इसमें छत्तीसगढी लोक शैली भी है। सारे कलाकार छत्तीसगढ़ी है और संवाद उनकी मातृभाषा में है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे लिये यह है कि इस नाटक के तैयार करने में मुझे इम्प्रोवाइजेशन आशुरचित का वो नुस्खा हाथ आ गया जिसके जरिये मैं बड़े-बड़े नाटक अनपढ़ ग्रामीणों से तैयार करवाने के काबिल बन सका। यही कारण है कि जब 1978 में मैंने मिट्टी की गाड़ी फिर से पेश किया तो उसकी भाषा छत्तीसगढ़ी बना दी, चुनांचे उसकी लोकप्रियता और बढ़ गयी। हालांकि अब तक मैं संस्कृत नाटकों से भी अच्छी तरह परिचित हो गया था और नाटयशास्त्र पढ़ चुका था। 1973 का ही वो जमाना था जबकि पहली बार अरस्तु और भरत मुनि के दृष्टिकोण के फर्क को मैं साफ तौर पर देख पाया।
1973 की और भी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि मैंने पहली बार लोक नाटकों और शास्त्रीय नाटकों के अंदर रस की एकता की बिना पर एक तालमेल महसूस किया। हालांकि 1955-56 में इंग्लिस्तान में जो अंग्रेजी किताबें मैंने दुनिया की कलाओं के सिलसिले में पढ़ी थीं उनमें यह गुमान जरूर पैदा हो गया था कि न सिर्फ लोक कलाएं दुनिया में पहले उत्पन्न हुई और शास्त्रीय बाद में, बल्कि हर जमाने में दोनों एक दूसरा पध्दति का असर लगातार कबूल करती रही। चाहे पंडितगण कुछ भी कहें। इन बातों पर गहराई से गौर करके अपने नतीजे पर पहुंचने का काम 1973 और उसके बाद के जमाने में पूरा हुआ। चरणदास चोर जो ससुराल के फौरन बाद मंच पर आया, इसी चेतना का नतीजा है। मैं बस इतना कहूंगा कि मुझे अपने रंगकर्म में खास अपने हस्ताक्षर की तलाश थी । जब मैंने महसूस किया कि वो मुझे बड़ी हद तक हासिल हो गया को इसके बाद मैं अपने दस्तखत बदल देने के हक में नही था। नाटक के इतिहास में मैंने यही देखा कि हस्ताक्षर की यह तलाश रंगकर्म के हर महत्वपूर्ण काम के लिए लाजमी है, चाहे वो स्तानैसलवस्की का काम हो चाहे ब्रेश्त ने आखिरी वर्षों में जितने भी नाटक लिखे और प्रस्तत किये उनमें शैली का कोई बुनियादी परिवर्तन देखने को नहीं।