पूरन सरमा
शायद उस बहुचर्चित काण्ड से तो आप भी परिचित होंगे जब मेरी एक व्यंग्य रचना दो बार छप गई थी। मेरी ही असावधानी के कारण हुई थी वह दुर्घटना। लेखक समुदाय मुझसे पहले से कुण्ठित था, बस उन्हें तो गोल्डन चांस मिल गया। धड़ाधड़ दफ्तर में लोग मिलने आने लगे तथा टेलीफोन बजने लगे।
एक ऐसी अनहोनी जिसकी मुझे कल्पना भी नहीं थी, सनसनी की तरह शहर की फिजां में फैल गई। रचना छपी उस दिन तक भी मुझे पता नहीं था कि काण्ड इतना विकराल रूप ले लेगा। लेखकों ने संपादक को पत्र लिख-लिख कर पस्त कर दिया तथा मांग की जाने लगी कि मुझे ब्लैक लिस्ट किया जाए। कुण्ठित लेखकों का यह मानना था कि वे मुझे ब्लैक लिस्ट कराने के बाद वे अपनी रचना आसानी से छपा सकेंगे।
दरअसल मेरी रचनाएं सर्वत्र छपती रही हैं और यह छपना ही उनकी मूल पीड़ा का केन्द्र बिन्दु था। वे आपस में भी मुझको ले कर तरह-तरह की बातें करते रहते हैं कि मैं इतना क्यों छपता हूँ, जबकि मैं इतना घटिया लिखता हूँ। वे जो कुछ भी मेरा छपता है, उसे घटिया भी मानते हैं तथा तुलना कर के यह तौलते रहते हैं कि उनका बढ़िया क्यों नहीं छप पाता। वे अपने आपको मूर्धन्य भी मानते हैं, उसके बाद भी छपने के मामले में सदैव मात खाते रहे हैं, इसलिए मेरी एक ही रचना कम अंतराल पर दुबारा छपी देख कर जहां वे दुखी हुए, वहीं वे बल्लियों उछले भी। उन्हें लगा कि वे इस मामले को तूल दे कर साहित्य के क्षेत्र में मुझे पछाड़ देंगे।
एक-दो सप्ताह तक तो वे लोग प्रतीक्षा कर पाए, बाद में उनका धैर्य जवाब दे गया और वे संपादक को स्मरण-पत्र दे-दे कर कोसने लगे। उन्हें लगा था कि किसी दिन अखबार में यह छपा मिलेगा कि मुझे ब्लैक लिस्ट किया जाता है। परंतु यह नहीं हो पाया। मजे कि बात देखिए कि मेरे से जो भी लेखक मिलता, वह उस रचना का अवश्य जिक्र करता, जो भी मिलता, कहता - अरे भई शर्मा जी, आपका व्यंग्य पढा था, बहुत बढ़िया था। कमाल कर दिया। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद में वे धीरे से बहुत ही सहज हो कर कहते - शायद यह पहले भी कहीं छप-छपा गया है।
मैं कहता - हाँ साब, जरा-सी गलती के कारण यह हो गया है। दरअसल संपादकगण जवाब नहीं देंगे तो यही होगा।
फिर वे पूछते - क्या पैसा भी दोनों जगह से आ गया है? उन्हें लगता था कि जैसे मैं लॉटरी का पहला इनाम एक ही टिकिट से दो बार ले रहा हूँ। मैं कहता - देखिए, पैसा तो अभी नहीं आया और कुछ लेखकों बनाम जागरूक पाठकों के होते, मैं ले भी नहीं सकता। उन्होंने पत्र लिख-लिख कर संपादक की हालत पतली कर दी है।
क्या मतलब? वे अनजान बन कर पूछते।
मैं कहता - वाह जनाब, पत्र लिखते रहे संपादक को मेरी शिकायत का और अब भोले बन रहे हैं।
वे नाराज होने का अभिनय कर के चले जाते।
संपादक ने पत्रों की बाढ़ को देख कर मुझे लिखा कि भाई, यह कैसे हो गया? मैंने स्पष्टीकरण दे कर संपादक को आश्वस्त कर दिया कि यह भूलवश असावधानी में हो गया है, तो वे मान गए, क्योंकि वे जानते थे कि ये इतने घुटे हुए हैं कि जानबूझ कर ऐसी शैतानी नहीं कर सकते, इसलिए यह असावधानी में हो गया है, अत: उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की तथा बात आई-गई हो गई।
परंतु लेखक समुदाय ऐसा होने नहीं देना चाहता था। उन्होंने प्रधान संपादक को पत्र लिखा कि यह गलत कृत्य सार्वजनिक रूप से निंदनीय है, अत: मेरे खिलाफ प्रतिबंध लगना चाहिए।
लेखक मिलते और कहते - भाई, आप तो बड़े लेखक हैं। दो बार भी एक रचना छप जाए तो क्या फर्क पड़ता है। पहले भी रचनाएं छपीं लेकिन किसी ने नहीं कहा कि मेरी रचना अमुक पत्र में छपी है। इस बार सारे लेखक मेरा व्यंग्य पढ़ कर प्रतिक्रिया देने को आतुर थे। जो भी लेखक मिलता वह प्रसन्न मुद्रा में मिलता कि जैसे मेरा भट्टा बैठ गया है अथवा मुझे दुबारा छपे अखबार की ओर से फाँसी दी जाने वाली थी या कि मैंने किसी दूसरे रचनाकार की रचना चुरा कर अपने नाम से छपवा ली थी। मेरी रचना, दस बार छपाऊँगा, वे कौन होते हैं। ऐसे आनंद मे विभोर थे कि जैसे उनकी अपनी कोई रचना छप गई हो। अब तक जिन लोगों ने किसी रचना के प्रकाशन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की थी, वे भी अपनी नि:शुल्क टिप्पणी दे रहे थे।
मुझे भी पता चला कि कितना प्रसिध्द लेखक हूँ। उनको एक आशंका यह थी कि कहाँ कोई कार्यवाही मुझ पर हो ही नहीं और हुआ भी यही। पूरा एक माह बीत गया। मैं साबुत निकल आया। मेरे खिलाफ अखबार में संपादक के नाम पत्र अथवा अन्य किसी भी स्थान पर कुछ नहीं छपा तो उन्होंने सिर पीट लिया अपना। एक दिन सारी कुण्ठित आत्माएं एक जगह पर मातमपुर्सी के लिए इकट्ठी हुईं और एक प्रस्ताव पास किया गया कि मुझ पर कड़ी नजर रखी जाए। इस बार यह बच गया, आगे फँसेगा इस तरह एक-न-एक दिन, एक-न-एक जगह तो जाल में आऊँगा ही। जैसे मैं लेखक नहीं कोई आतंकवादी हूँ - जिस पर पूरी निगरानी रखा जाना आवश्यक हो।
परंतु तब तक तो मैं सावचेत हो गया था। वह तो भूल से छप गई थी, अब वैसी घटना होने का प्रश्न ही नहीं था। वे रोज प्रतीक्षा करते अखबारों की कतरनें सावचेती से रखते, रचनाओं को मिलाते। परंतु इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हो पाई। लोग बड़े परेशान कि मैं पहले जैसी भूल क्यों नहीं कर रहा? कुण्ठित लेखकों का एक दल एक दिन मेरे पास आया और हताश स्वर में बोला - क्यों भाई शर्मा जी, क्या हुआ? क्या आजकल रचनाएं दूसरी जगह प्रकाशनार्थ नहीं दे रहे हैं?
मैंने कहा - देते क्यों नहीं, परंतु एक ही रचना को दुबारा प्रकाशनार्र्थ नहीं देता। वह इसलिए कि आप सब जागरूक पाठक हैं और जागरूक पाठक के साथ मैं कोई चोट नहीं कर सकता।
लेकिन हम क्या करें?
आप अपनी रचनाएं छपवाइए।
लेकिन आपके होते...
क्यों मेरे होते क्या दिक्कत है?
दिक्कत है भाई। पहले सर्च लाइट ने तुम्हें ब्लैक लिस्ट करने का मानस बना लिया था, पर पता नहीं बाद में तुमने क्या जादू किया? लेखक समुदाय बोला।
मैं बोला - अब पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत। आपको भी मैं असलियत बता दूँ कि मैं जानबूझ कर कभी भी अपनी रचनाएं दो बार नहीं छपवाता। वह तो असावधानी में हो गया अन्यथा हमने कच्ची गोलियां नहीं खाई हैं।
लेखक प्रतिनिधि मण्डल चला गया। उनकी शक्लें देखते ही बनती थीं। उन्होंने इस बात पर भी विचार किया कि इस बात को ले कर मुझ पर कोई मुकदमा भी चलाया जा सकता है क्या? परंतु वकील ने इस मामले में उन्हें निराश कर दिया। कई बार वे लोग मुझे भौतिक रूप से पीटना चाहते हैं, क्योंकि वे किसी भी तरह मुझे बरदास्त नहीं कर पा रहे हैं। इन दिनों उन्होंने मेरा व उस अखबार का बहिष्कार कर रखा है, जिसने मेरी प्रकाशित रचना छापने के बाद भी मुझ पर कार्यवाही नहीं की है। वे उस अखबार के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं।
वे मुझे साहित्यिक रूप से मारने के उपाय खोजते हैं परंतु कोई अस्त्र हाथ ही नहीं लग पाता। मेरे पास भी तो उनकी काट उपलब्ध है। वे अस्त्र मारते हैं तो मैं अपने दिव्यास्त्र निकाल कर फेंकता हूँ तो चारों खाने चित्त पड़े नजर आते हैं। उन्हें अपने नहीं लिख पाने का जरा भी रंज नहीं है परंतु मेरे लिखने से बड़े आहत हैं।
कोई मुझे मशीन कोई कम्प्यूटर कोई व्यावसायिक अथवा कोई थोक विक्रेता आदि-आदि नामों से भी पुकारता है। उनका दर्द यह है कि मैं लिखता क्यों हूँ। मेरा उत्तर यह है कि मैं लेखक हूँ, लिखूँगा नहीं तो भाड़ थोड़े ही झोंकूँगा। लेखक तो लिखता ही है, परन्तु कुछ समझ में नहीं आ रहा कि इसका इलाज क्या है? परंतु फिर मेरी समझ में आता है कि लेखकों की यह तो लाइलाज बीमारी है, इसकी दवा कहीं नहीं है, वे ऐसे ही दाँत पीसते रहते हैं तथा पूरे जीवन एक-दूसरे की टाँग खींचते रहते हैं।