शहरी सभ्यता से अच्छी ग्रामीण सभ्यता

बरखा होता

उस दिन अल सुबह जब मैंने चाय की चुस्कियों के साथ अखबार हाथ में उठाया तो मन आनंद से भर उठा। उस दैनिक में एक विज्ञापन छपा था जो काफी बड़ा था। किसी भी पाठक का ध्यान उस ओर आसानी से जा सकता था। विज्ञापन में लिखा था - बेटी है अनमोल, बेटी के बिना आपका जीवन अधूरा है । उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए। और अंत मे लिखा था भ्रूण का लिंग निर्धारण अपराध है।

थोड़ी देर बाद जैसे ही मैंने दूसरा अखबार हाथों में लिया वह पढ़कर खुशी काफूर हो गई। पहले अखबार के विज्ञापन का आनंद मुझे इसलिए भी हुआ होगा क्योकि मैं स्वयं एक लड़की हूँ। और दूसरे अखबार को पढ़कर आनंद इसलिए गुम हो गया क्योकि वह समाचार भी उस विज्ञापन से संबंध रखता था। उस दैनिक में कन्या भ्रूण हत्या पर एक संपादकीय छपा था। संपादकीय ये किसी भी अखबार का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

आमतौर पर लोग उसे सरसरी तौर पढ़ते हैं परंतु मुझे उसे पढ़ने की वह भी पूरा का पूरा पढ़ने की आदत सी है। उसमें लिखा था शहरी क्षेत्रों में कन्या भ्रूण हत्या के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए शासन के अलवा समाजा की पहल भी बहुत जरूरी है। संपादक महोदय को जाहिर है इस विषय पर लिखने को मजबूर होना पड़ा होगा क्योंकि ऐसा पापी कृत्य होता रहा तो मानवीय सभ्यता का अस्तित्व इस दुनिया से मिट जाएगा। उनकी पीड़ा बहुत सही है। एक लड़की होने के नाते मैं ये सब नहीं कह रही हूँ, बल्कि ये मानव हत्या है और हमारे धर्म में इससे नीच और अक्षम्य पाप कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। संपादकीय में कन्या भ्रूण हत्या के जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे वे सिर्फ चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। पंजाब के पटियाला के एक कुएं से करीब दो दर्जन कन्या भ्रूणों की बरामदगी की गई। यह महापाप भगवान जाने कब से चल रहा था। आश्चर्य की बात यह है कि जिस कुएं से ये भ्रूण बरामद किए गए वह एक निजी अस्पताल के पीछे स्थित है। समझने वाले को इशारा काफी है। जाहिर है इस अस्पताल में भ्रूण लिंग पहचान का काम या गोरखधंधा पिछले कई वर्षों से चल रहा होगा।

शासन ने ऐसे परीक्षणों को कानूनी अपराध घोषित किया है, परंतु सिर्फ कानून से यह महापाप, यह अक्षम्य कृत्य नहीं रुकने वाला है। इस दिशा में सामाजिक जनजागरण की महती आवश्यकता है। अंग्रोी की यह कहावत - चेरिटी बिगिन्स एट होम, को सभी ने जाना है, पढ़ा है और समझा भी है। तात्पर्य यह है कि दान की शुरूआत स्वयं से होनी चाहिए। किसी काम को करने की सलाह देने वाले को चाहिए कि वह इसे स्वयं पहले करें बाद में दूसरों को बताएं। यह चैरिटी सबसे पहले उन परिवारों से शुरू होनी चाहिए जहां इस प्रकार भ्रूण लिंग को पहचानने का कुत्सित प्रयास किया जाता हो।

अवैध संबंधों से धारण हुए गर्भ को गर्भपात के जरिए नष्ट कर देना आम बात है। परंतु अभिजात्य वर्ग यदि ऐसे कृत्यों में लिप्त पाया गया तो ऐेसे व्हाइ कॉलर क्राइम को कैसे रोक पाएंगे। कन्या भ्रूण हत्या और अवैध गर्भपात का गोरखधंधा कमोबेश देश के हर राज्य में धड़ल्ले से चल रहा है। यदि कन्या भ्रूण हत्या का यह सिलसिला इसी प्रकार जारी रहा तो तो लड़कियों की संख्या इतनी कम हो जाएगी कि आने वाली पीढ़ियों के सामने वंश को बचाने का गहरा संकट उत्पन्न हो जाएगा।

राजस्थान के झीलों के शहर उदयपुर में भी एक निजी अस्पताल ने तीन भ्रूणों को झील फिंकवाया था। चंडीगढ़ में तो स्त्रियों की संख्या अत्यधिक कम हो गई है। देश के कई हिस्से इस अल्प कन्या उत्पादन के कारण डार्क जोन बन गए हैं। देश के जनसंख्या आयुक्त के अनुसार पिछले दस सालों में डेढ़ करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार डाला गया। हैरत की बात यह है कि जिसे हम शिक्षित और सुसभ्य बताते हैं वही तबका ऐसे कृत्यों में अधिक लिप्त पाया गया है। हमारे ऐसे सुसंस्कृत, सभ्य और शिक्षित होने का क्या फायदा। उससे तो वह ग्रामीण सभ्यता अच्छी है जो शहर की चकाचौंध से दूर रह कर, गरीबी का जीवन व्यतीत कर अधिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद भी कन्या को अपनी लाड़ली संतान मानते हैं। वे ऐसा पाप करने से हमेशा बचते हैं। उनका पूरा विश्वास हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति पर अधिक है।

शहरों में ऐसे पापी कृत्य होने का एक मुख्य कारण यह भी है कि सारी हाईटेक चिकित्सा सुविधाएं यहां आसानी से उपलब्ध हैं। और आम आदमी को भी थोड़े से पैसे में भ्रूण लिंग की पहचान का कार्य सुलभ हो जाता है। कानूनी बंदिशों का पालन सिर्फ अस्पताल में लिखे वार्डों तक ही सीमित रह गया है। जब जन्म देने वाला ही इस पाप को करने के लिए तैयार रहता है तो फिर डॉक्टर को पाप का भागीदार बनने में भला क्यों परहेज हो सकता है। वह तो पैसे के लिए कुछ भी कर सकता है।

समय रहते हम सभी को इस गंभीर विषय पर सोचना पड़ेगा। प्रत्येक एनजीओ को जन-जन में यह चेतना लानी होगी कि भ्रूण हत्या पाप है। बच्चे भगवान का रूप होते हैं। भगवान की हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से बचें। लड़का हो या लड़की विधाता का प्रसाद समझ कर स्वीकार करें। अपनी औलाद की खुशियों के साथ अपना जीवन व्यतीत करें। इंसान न हिन्दू होता है, ना मुसलमान वह तो इंसान की औलाद हो कर इंसान बनता है।