सदर दरवाजा

प्रस्तुत पुस्तक को स्रीमती तिवारी ने अपने परमपूज्य पितामह स्व. प्रभवनाथ तिवारी जी को समर्पित किया है। यह उनका दूसरा कहानी संग्रह है। पहला कहानी संग्रह ‘पिंजरा’ गत वष4 प्रकाशित हुआ था जिसे साहित्यकारों ने बड़ी ही सहजता से स्वीकार किया है। इनकी कहानियोंको पढऩे के उपरान्त ऐसा प्रतीत होता है कि मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित ग्रामीण परिवेश की कहानियों की अगली कड़ी के रूप में श्रीमती तिवारी की रचनाएं हिन्दी के वर्तमान काल की सशक्त हस्ताक्षर हैं।

तुलसीदेवी की कहानियों का कथानक हिन्दी क्षेत्र के एक विस्तृत अंचल को समेटे हुए हैं जिसमें गंगा की समरसता पवित्रता से लेकर शिवनाथ की छटा का आप सहज दर्शन कर सकते हैं। ग्रामीण परिवेश ग्रामीण जीवन की सहृदयता उनमुक्त वातावरण के साथ ही वर्तमान जीवन की संकीर्णता छलनापूर्ण उद्देश्य एवं उसके निमित्त कुत्सित उद्योग को आप बड़ी ही सुगमता से परिलक्षित कर सकते हैं। ग्रामीण परिवेश ग्रामीण संस्कृति की झलक तथा उसमें आधुनिकता से उत्सर्जित मानवीय कुंठाओं, झल-प्रपंच तथा टूटते हुए परिवार की संक्रमित भावनाएं निश्चय ही आपके मन को उद्वेलित कर सकती हैं।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर (21वीं सदी के वर्तमान काल में आप बहुत सी पिछली मान्यताओं परिवारों की टूट तथा दिलों के बीच (जनरेशन गैप) बढ़ती दूरी के द्वारा मानवीय भावनाओं के बार-बार होते विस्मयकारी किन्तु सत्य-सत्य विखंडित संबंधों की झांकी अवश्य श्रीमती तिवारी की रचनाओं में देख सकते हैं।  read more »

देवेन्द्र के भी दीपक

दीपक जी याने देवेन्द्र दीपक जिनकी मैं इस बात सेसहमत हूं कि संपूर्ण नाम को अक्षर समूह में न रखते हुए अलग-अलग कर उनका अवलोकन, अध्ययन, मनन और अभिव्यक्त करने वाली परिपाटी रचनी चाहिए।

ऐसा नहीं है कि पूर्व में ऐसा न हुआ हो, हुआ अवश्य है और उस परस्तिति में अइधक हुआ है जब कवि या लेख ने अपने नाम के आगे किसी उपनाम की स्थापना की हो। मैं इस बात सेसहमत हूं किबिना उपनाम के भी आप अच्ची रचना कर सकते हैं फिर भी मैं उपनाम का विरोध नहीं करूंगा। दीपक एक भौतिकवस्तु है किन्तु उसकी एक लौ सारे संसार को आलोकित कर सकती है और कर भी रही है। दीपककी एक बाती ने कालान्तर में अनेक बातियों को अपने आप में अपने समूह में सम्मिलित करने का निश्चय कर लिया है।

आगे जहां और भी है कि भांति समई का स्वरूप पा लिया है, अनेक धाराओं से, अनेक बातियों सेचहुं दिशा में अपने आलोक का विस्तार करना वह बखूबी जानती है। मैं समई में लगने वाले प्रकाश के लिए आवश्यक, तेल-घी भी बात करूंगा और कहूंगा इसी सरोवर से प्राप्त ऊर्जा से कवि जो रचता है, वह सब प्रतीक के तौर परदीपक के साथ-साथ चल रहा है। अनेक धाराओं में काम करने के शतप्रति सक्षम वे हैं। इसे पुन: सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। जिसने अमृत स्तल को छू लिया हो वह शिव की सुन्दरता में निवास करने का अधिकारी बन जाता है।

उसे किसी राजपथ की आवश्यकता नहीं होती है, वह अपना स्थान स्वयं बना लेता है, उसे साहित्य वर्षा के लिए किसी इन्द्र की आराधना नहीं करनी पड़ती है अत: किसी भी ऋतु में झंझावातों से अपने आपको बचाने वाला दीपक देवेन्द्र दीपक है। उन्हें आज भी कुछ गैरसामाजिक मान्यता प्राप्त असहमतियों का सामना भी करना पड़ता है, आज भी पड़ रहा है। आज मुझे भरत व्यास की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते -निर्बल से लड़ाई बलवान की-और आगे के भाव को यथार्थ में बदलने वाले दीपक आज भी आलोकित हैं।

अभी तक मैंने उनके नाम के अर्थ पहचानने का प्रयत्न किया है, मैं अब उनके कामों की चर्चा करूंगा। वे जिस भारतीय संस्कारों से होते हुए इस अमृत-कलश तक की यात्रा सम्पन्न की है एक अनूठा और अनुकरणीय तो है ही साथ ही साथ इस बात का भी द्योतक है कि अपने आपको किस प्रकार निष्पक्ष रखाजाय। हम उन परभारतीयता के अतिरिक्त किसी प्रकार का भी लेबलनहीं लगा सकते। मानवीय संवेदनाएं उनका प्रथम चिन्तन है जिससे वे भी सहमत हूं। इसका परीक्षण करने के लिए उनके पास तक जाना होगा।  read more »

प्रेम दीपक की अक्षय ऊष्मा : ‘बीच डगरिया’

अक्षय गोजा द्वारा रचित गीत संग्रह ‘ बीच डगरिया’ गीतों और मुक्तकों का संग्रह है। 112 पृष्ठीय इस कृति में कुल 90 गीत/मुक्तक संग्रहित हैं। कृति की भूमिका में जैसा वे स्वयं लिखते हैं कि छंद मुक्त कविताएं वे आरंभ से ही लिखते रहे हैं। इसमें गजलों का एक विशेष दौर रहा है। लेखन और प्रकाशन के बाद उपजे शून्य में पुन: ये छूटे हुए गीत और मुक्तक अपनी ओर आकृष्ट करने लगे और उनका संकलन प्रकाशन उन्हें नव-जीवन दे गया। ये गीत उनके जीवन दर्शन से उत्सर्जित प्रेम साधना व्यक्ति निष्ठा, स्मृति-विस्मृति प्रकृति के प्रत्यक्ष परोक्ष अनबूझे सान्निध्य और स्वस्थ आत्मा भिव्यक्ति के निष्कर्ष प्रतीत होते हैं। जहां जीवन का सारा रस अपने विशिष्ट रसभाव के साथ रस निषपत्ति का आधार बन जाता है।

कुछ भी नहीं था मैं तो जिंदगी में अब तक (पृ.66) अमर प्यार ने अर्थ जीवन का समझा दिया। शायद यही इस गीत संग्रह की प्रेम दीपक रूपी अक्षय ऊष्मा है जो सम्पूर्ण जीवन को चिर मिलन विरह की शक्ति से सक्रिय बनाए रखथी है। इनमें प्रधान भाव प्रेम व्यंजना है जैसे ‘तुम जो मिलो’ ‘याद तुम्हारी’, ‘मीठे बैना’, ‘तुम अपना हाथ दो’, ‘नैनों से प्रीत’, ‘खेल प्रीत के’, ‘प्यार के काबिल’, ‘कहीं और तो नहीं’, ‘ यह बात’, ‘ भटक गए’, ‘यादों का असर आए’, ‘ नई मुहब्बत करते हैं’, ‘ तुम ही तो हो’, ‘ जितना तुझे चाहा’, ‘ मैं भी तुमसे भर पाया’, ‘ मेरा न कोई तेरे सिवा’, ‘ हमारी मुहब्बत’ जैसी कविताएं/गीत मानवीय प्रेम की चिर परिचित कथा यात्रा को रूपायित करते हैं।  read more »

यात्रा बेगूसराय की

शीत का उत्कर्षकालीन समय था। प्रात: 4.45 बजे ट्रेन जिस स्टेशन पर रूकी, वह था बेगूसराय। छत्तीसगढ़ प्रदेश के किसी छोटे शहर के स्टेशन जैसा-इत्मीनान और सुकून से भरा। इक्के-दुक्के लोग आते-जाते दिखे, सूचित भाव से बतियाते हुए। किसी मेट्रो सिटी जैसे धड़धड़ाते, ऊपर-नीचे, आगे-पीचे, भागते-दौड़ते, गिरते-हपटते, छकियाते, रफ्तार पकडऩे की धून में पगलाए लोग नहीं थे यहां। गिने-चुने कुछ चेहरे या कहें कुछ साये।

अंधेरा पूरी तरह छटा नहीं था। हमारे पासदो सूटकेस और एक एयरबैग था। काव्यकोष्ठी में सम्मिलित होने और पुस्तक का विमोचन करने आए थे हम। ऊनी वस्त्रों और कम्बल सेहमारे (मेरे साथ पतिदेव श्री प्रदीप जी भी थे) हाथ-पैर, कान-मूंह सब ढंके थे, सिर्फ आंखें टुकुर-टुकुर देख रहीं थी इधर-उधर। नकाबपोशों जैसी हमारी वेशभूषा, पहनावा और हाथ का सूटकेस यह भ्रम उत्पन्न कर रहा था कि सूटकेस में कपड़े लत्ते और गोष्ठी में पढ़ी जाने वाली कविता न होकर चोरी-डकैती या फिरौती के रूपए होंगे।

रमण साहब आने वाले थे हमें रिसीव करने। पर अब तक आए नहीं थे, और जाने आ भी जाते तो हम पहचानते कि नहीं, क्योंकि हमारी तरह ही सबका हुलिया दिख रहा था। दो कदम आगे बढ़े तो अचानक कानों में चिर-परिचित आवाज सुनाई पड़ी। नमस्ते मैडम। आइए अग्रवाल साहब। इनसे मिलिए हमारी धर्मपत्नी हैं। सूटकेस नीचे रखकर हमने अभिवादन में अपने हाथ जोड़ें। रमण साहब (हमारे मेजबान) इस कडक़ड़ाती ठंड में 20 कि.मी. दूर गांव से सपत्नीक हमें लेने आये थे। हमारे न-न करतेरहने पर भी लगेज उन दोनों ने उठा लिया कौन कहता है भारत की संस्कृति, रस्म-रिवाज और बोल-चाल पीड़ी-दर पीढ़ी पीछे छूटती जा रही है?

अतिथि देवोभव: की संस्कृति लुप्तप्राय होती जा रही है? हम उनके साथ स्टेशन से बाहर आए। उनके साथ उनके कार में रवाना हुए। कुछ ही देर में उनके गांव पहुंच गए। गांव में आज उनके नवनिर्मित मकान का उद्घाटन समारोह था। हमें देखकर पूरा परिवार हरसिंगार की महक बिखेरता बिछ सा गया कॉफी आई। सबने गर्मागर्म काफी की चुस्की ली और फिर शाम को मिलने के वायदे के साथ हम सब रमण साहब के साथ होटल सायोनारा आ गए।

यहां आप रिलैक्स होइए। जो खाना हो आर्डर कर लें। हमारे आने की खुशी उनके चेहरे से झलक रही थी। मैं शाम को गाड़ी भेजूंगा। आकर इस मकान को घर बनाइए। उन्होंने निश्छल हंसी बिखेरी।  read more »

यक्ष भाषा

पर यक्ष जिस भाषा में पूछेगा प्रश्न
वह तो सीखनी रह ही गई
मां के दूध के साथ
तुतलाहट भरी
सीख ली थी वह पहाड़ी बोली
विद्वान जिसे कहते रहे अपभ्रंश
नारियल की फटी टाट पर
कौवे की क...का...पंचम स्वर में चलती रहती

जब तक घिस नहीं जाता था पाजामा  read more »

कविता बंजारन सी

बंजारन सी कविता।
पंख लगार सपनों के वो,
भ्रमण करे सारी सृष्टि,
जीवन के सूने पतझर में,
करे सदा अमृत वृष्टि,
होठों पे मुस्कान अमर सी, आंखों में बहती सरिता,
बंजारन सी कविता।
छान्द बने पायलिया इसकी,
लय चुनर सी लहराती,  read more »

तेरी आंखों में संसार

तेरी आंखों में संसार।
प्रेम पर निबंध लिखती,
भीनी-भीनी सी पवन,
आसमां देता निमंत्रण,
उडऩे को आतुर है मन,
पूछता है प्राण मुझसे,
कितना पांखों का विस्तार।
तेरी आंखों में संसार।

महक उठा मन का उपवन,
मधुर मिलन मदहोश घड़ी,  read more »

जमाने भर में

ऐसे सभी मकान बने हैं।
दीवारों में कान बने हैं।।
मेरे दो, जमाने भर में।
मेरी अब पहचान बने हैं।।
कहने को ये मेरा घर है।
जिसमें हम मेहमान बने हैं।।
दुश्मन है जाना पहिचाना।
क्यों हम सब अनजान बने हैं।।
घर आंगन में है अंधियारा।  read more »

पहले तोल लो

गुफ्तगू करने से पहले तोल लो
हरकिसी से दुश्मनी मत मोल लो
ठोकरें खाओगे सारी किान्दगी
है यही बेहतर कि आंखें खोल लो
न$फरतें भी काम आयेंगी कभी
न$फरतों में प्यार का रस घोल लो
वक़्त आयेगा हमारा भी काुरूर
तुमको जितना बोलना है बोल लो  read more »

इस कोने में

काल का कबाड़-घर
काल के कबाड़घर में
पता नहीं कितना
कबाड़ भरा है।

इधर, इस कोने में
श्री-श्री 108, 1008
महामंडलेश्वर,
महाराजाधिराज, भूपति,
अखिलेश्वर,
योद्धा देहधारी,
आतंकी, आततायी,
भक्तगण, पंडे-पुजारी,
नेता-अभिनेता,
शब्द-शिल्पी साहित्यकार,
साधक, आराधक,
निपुण कलाकार,
चारण-भाट, दरबारी,
सामन्त और श्रीमन्त,
दस, बीस, तीस हजारी,
जाने कितने भरे हैं।  read more »

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