शहरी सभ्यता से अच्छी ग्रामीण सभ्यता

बरखा होता

उस दिन अल सुबह जब मैंने चाय की चुस्कियों के साथ अखबार हाथ में उठाया तो मन आनंद से भर उठा। उस दैनिक में एक विज्ञापन छपा था जो काफी बड़ा था। किसी भी पाठक का ध्यान उस ओर आसानी से जा सकता था। विज्ञापन में लिखा था - बेटी है अनमोल, बेटी के बिना आपका जीवन अधूरा है । उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए। और अंत मे लिखा था भ्रूण का लिंग निर्धारण अपराध है।

थोड़ी देर बाद जैसे ही मैंने दूसरा अखबार हाथों में लिया वह पढ़कर खुशी काफूर हो गई। पहले अखबार के विज्ञापन का आनंद मुझे इसलिए भी हुआ होगा क्योकि मैं स्वयं एक लड़की हूँ। और दूसरे अखबार को पढ़कर आनंद इसलिए गुम हो गया क्योकि वह समाचार भी उस विज्ञापन से संबंध रखता था। उस दैनिक में कन्या भ्रूण हत्या पर एक संपादकीय छपा था। संपादकीय ये किसी भी अखबार का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।  read more »

एकांत के दोहे

नरेन्द्र सिंह परिहार

यौवन की कस्तूरी ने दे दी तेरी गंध।
मन पागल हुआ बोला, पीने दे मकरंद॥

ऐसी सुरभि को बिखरा, जाओ न तनिक दूर।
पर आलिंगन लालसा, करो न चकनाचूर॥

बाब कट इन केशों से, दमका तेरा रूप।
मैं तेरी छाया बनूं, तू मेरी धूप॥

तनखाह ने बदल दिया, गोरी का व्यवहार।  read more »

मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है

वरिष्ठ प्रगतिशील कवि डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया से डॉ. राजेश कुमार की बातचीत

मैं डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया के आवास पर एटा पहुँचा। उनसे मिलने के लिए मैंने डोर बैल बजाई। अन्दर से श्रीमती गार्गी देवी (सिसौदिया जी की पत्नी) ने कमरे का दरवाजा खोला। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने मुझे बैठने को कहा। मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने डॉ. सिसौदिया जी के बारे में पूछा। वे बोलीं - प्रतीक्षा कीजिए, डॉ. साहब अभी आ रहे हैं।

साफ-सुथरे कमरे में टंगा अभिनन्दन-पत्र सिसौदिया जी के कवि-व्यक्तित्व की प्रगाढ़ता को व्यंजित कर रहा था। सिसौदिया जी की कुछ कविताओं का स्मरण कर मैं विचारमग्न हुआ ही था कि सिसौदिया जी ने कमरे में प्रवेश किया।  read more »

पेपर वेट

वीरेन्‍द्र गोयल

शुक्र है
उसने मारा पेपर वेट
अरे भाई
मारा नहीं फेंका
अगर न चूकता
तो कोई भी अंग
हो जाता भंग
संसद की तरह
जुड़ने में वक्त लगता
और जैसा आया है
वैसा कहाँ जुड़ता
मान लो
हाथ में कुछ और होता
यानी टाइप राइटर
पेन स्टेड
यानि साथ खड़े सिपाही की बंदूक
तब क्या करते
वहीं पर ढेर होने के अलावा
क्या चारा था  read more »

मुखबिर

वीरेन्‍द्र गोयल

रोज बरामद होते हैं चाकू
और बोतले शराब की
अध्धे, पव्वे, पाऊ च
इतनी चौकसी के बाद भी
खबर हमेशा
मिलती है मुखबिर खास से
मौजूद रहता है जो
हर जगह
कोई नहीं देख पाता उसे  read more »

सरगुजिहा देशभक्ति गीत

राजेन्‍द्र प्रसाद वर्मा

धरै लेबो हमन संगी जम्मोच झन मसाल गा,
बैन जाबो हमन संगी, बैरी मन कर काल गा।
आगू माया जम्मोच झन ला, हमन दो सीखाबो,
नई मानही तेकर पाछू, हमूं मन बताबो।
हाथ-गोड़ ला टोयेर-टोयेर, उधेड़ब हम खालगा,
धरै लेबो हमन संगी...
ओहू मन कहीं हमन संगी, काकर पहटा परेन,
अन्नभनियाँ लेहमन संगी, येमन हे लड़ेन,
देश कर सिपाही हवन, फेंकबो हमन जाल गा।  read more »

सरगुजिहा श्रृंगार गीत

राजेन्‍द्र प्रसाद वर्मा

तोर पैरी करतान
मारेल छाती हें बान।
कलेप कलेप रही जाथें,
लईका सियान।
तोर पैरी कर...
नाचा देखे बरे संगी,
तोरेच ठन जाथे।
छुनुर-छुनुर पैरी ला,
ढेरेच ले पतियाथें।
देख-देख के, सुईन-सुईन के,  read more »

गीत

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

क्यों हो गया समय विद्रोही,
क्यों साध सब पंगु हो गए,
मानव की मानव से - शायद-
मानवता पर ही अनबन है।
रिक्त हुई इच्छायें सारी,
या फिर है अपनी लाचारी,
कोई रहा नहीं व्यवहारी।
द्वेष, कपट, छल, छीनाझपटी,  read more »

गमछा

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

यह हिरदेगढ़ का गमछा है।
मजबूती थी पहले तार-तार,
अब हुआ न जाने जार-जार।
कीमत का पाया सदुपयोग,
उपयोगी था, कर पाया नित प्रयोग।
न आह भरी शिकवे ही किये
रगड़ा, धोया, पोंछा, सब काम लिये
यह ग्रीष्म स्वेद षोषक भी है।
सर्दी रक्षक, पोषक भी है।
विद्युत-प्रवाही- योग हुआ।
तीमारदार है यह गमछा,
यानी कि, अच्छा चमचा है।
यह हिरदेगढ़ का गमछा है।  read more »

मोहक क्षण जी लें

डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा

आओ रानी रसघट पी लें
फिर से कुछ मोहक क्षण जी लें
खर्च कटौती आपाधापी
छोड़ो सब खटराग पुराना
हल्दी, तेल, खटाई, दलहन
आसपास संबंध निभाना
चढ़ा गैस पर दूध न उबले
कपड़ा गरम न कीड़े घाएं
थोड़ी देर पास आ बैठो
छोड़ो ये सारी चिन्ताएँ  read more »

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