अक्सर

अक्सर
सोच से विपरीत
होता है घटित
बहुत कुछ...
अक्सर
कल्पना के केनवास
में नहीं भर पाते
मनचीते
इन्द्रधनुषई रंग...
अक्सर
नहीं पढ़ पाते
अंतिम क्षण तक
नेह की परिभाषा
हमारे चंचल नयन..
अक्सर
काट दिए जाते हैं
ऊड़ान से पूर्व...
हौसले के पंख
अक्सर
मटमैला हो जाता है
ऑंखों से छलक गया
अश्रुजल
गालों पर जमा पसीने  read more »

जमाने लदे भले के

मुक्ताप्रसाद गुप्त

हमने दो जुग इनके देखे, हृदय-पटल पर लेखे।
मटियामेट सबई कर डारो, बेईमान धरे के ॥
भ्रष्टाचार करे मनमाने, नोटन से घर छेके।
न्याय रोंद डारो पैरन में, इनसे सबई तरेके॥
चमचन कौ जे संग देत है, चलत उन्हें नित लैकें।
जाको पतिया जाबें बाकों, करत काम सँग दैकें॥
सही काम कओ नहीं करें जे, ये ते यार ढुरे के।
कर डालो रत्नेश क्रांति अब, लद गए समय भले के॥

बरसात प्यार का मौसम है

धरती पागल - अम्बर पागल

बरसात का मौसम है। आकाश में काली घटाएँ छा रही हैं। उमड़-घुमड़ कर काली घटाएँ कड़क कर गर्जना करती है। पशु और अन्य जीव-जन्तु भी तेज वर्षा से परेशान हैं। घमण्डी बादल आकाश मे घोर गर्जन करके धरावासियों को भयभीत कर रहे हैं।

ये घमण्डी बादल राम के जमाने में भी घोर गर्जन करते थे।

ये सिया के रावण द्वारा हरण के बाद सिया के अबाव में मेघ गर्जन से डरते थे। उनका मन भयभीत होता था। महाकवि तुलसीदास ने अपने महाकाव्य रामचरित मानस में प्रिया सिया के वियोग में मेघ के घोर गर्जन से भयभीत होते हुए राम के मुख से कहलवाया है –

घन घमण्ड नभ गरजत घोरा।
प्रिया हीन मन डरपन मोरा॥

जब से रामचरित मानस को मैंने पढ़ लिया है, तब से ही मैं अपनी प्रिया के वियोग में मेघ गर्जन करने पर भयभीत होने लगा हूँ। इसके पूर्व कई बार मेरी पत्नी अपने मायके गई है। परन्तु बरसात में मैं उसके बिना कभी नहीं डरा, परन्तु अभी जबकि वह बरसात के मौसम मे मुझसे रूठ कर मायके गई है। बादलों के गर्जन से मुझे डर लगने लगा है। सच जानिए वर्षा का आनन्द भी जैसे रूठ कर कहीं चला गया है।

प्रिया ने ऐसा जादू कर दिया है कि उसके वियोग में मेघ गर्जन डरावना लगता है। अब देखिए विवाह नहीं हुआ था तो बरसात में बादल गरजने पर डर लगता ही नहीं था। मेरा ख्याल है कि माँ-बाप के वरद्हस्त का प्रभाव भी इसमें था। जब वे इस दुनिया में नहीं रहे तब भी बरसात के कड़कते मेघों से मैं कतई नहीं डरा। शायद इसलिए कि उन्होंने मुझे निडर बना दिया था। किन्तु पत्नी के आते ही मैं डरपोक हो गया। है न विचित्र बात। उसने आकर मुझे डरपोक बना दिया।  read more »

गालें

- अशोक गीते

(1)
कहने में आसान बहुत है।
जीवन में तूफान बहुत है।

मत कर बातें बढ़चढ़ के अब।
भाई तू नादान बहुत है ।

बैसाखी पर खड़ा है लेकिन।
ले दिल में अरमान बहुत है ।

सच कहना तो आदत उसकी,
भोला है अनजान बहुत है।

बहुत लगा बोली उसकी,
पर उसमें ईमान बहुत है।
(2)
डगर-डगर आवारा मन।
बहती नदिया धारा मन।

फैला मावस का अंधियारा,
जूगनूं सा अंगारा मन।

माना राहें कठिन हमारी,
नहीं कभी ये हारा मन।  read more »

लोकरंग के चर्चित वेबसाइट

- जयप्रकाश मानस

काश, छत्तीसगढ़ी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने वालों भी समझ में आती कि ऐसे जाल स्थलों के द्वारा विश्व के छत्तीसगढ़ी भाषियों को एक मंच पर जोड़ा जा सकता है ।

खजाना में भारत, इंडोनेशिया, नेपाल, थाइलैंड के लोककला की ढेर सारी सामग्रियों को बेजने के लिए सजाया गया है ।

जिन्होंने गोपीचंद का इकतारा और मीरा का इकतारा जीवन में न देखा हो वे यहाँ चित्र ही देखकर बिना उसे अपने लिए सेव किए नहीं रह सकते हैं । कंपनी को साधुवाद दीजिए कि उसके लोक कलात्मक वस्तुओं का विस्तृत जानकारी भी यहाँ जुटा रखी है और हाँ खरीदने के लिए जेब में क्रेडिट कार्ड हो तो क्या कहने ।

ऑनलाईन आदेश दिया और पैकेट आपके घर के पते पर । ऐसा ही एक वेबजाल है- सालिनीक्राफ्ट जहाँ लोक कलात्मक चीजों का संग्रह है ।  read more »

मैं आ रहा हूँ

-सुभाष मुखोपाध्याय

मैंने आसमान की ओर देखा
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
मैंने बन्द की ऑंखें
वहाँ तुम्हारा चेहरा था
वज्र को बहरा कर दे ऐसे आवाज में तुम मुझे पुकार रहे हो
बच्चों की आवाज में
दिन और रात के टुकड़े-टुकड़े कर
कौन रो रहे हैं ?
मौत के आतंक में जीवन से लिपट कर
कौन रो रहे हैं ?
और इसलिए  read more »

जननी जन्मभूमि

मैं माँ को बहुत प्यार करता था
कभी अपने मुँह से नहीं कहा मैंने
टिफिन के पैसे बचाकर
कभी-कभी खरीद लाता था सन्तरे
लेटे-लेटे माँ की ऑंखें डबडबा जाती थीं
अपने प्यार की बात
कभी भी मुँह खोलकर मैं माँ से नहीं कह सका।
हे देश, हे जननी
मैं तुमसे कैसे कहूँ !
जिस धरती पर पैरों के बल खड़ा हुआ हूँ ....
मेरे दोनों हाथों की दसों उँगलियों में
उसकी स्मृति है
मैं जिन चीजों को छूता हूँ
वहां पर हे जननी तुम्हीं हो
मेरी हृदयवीणा तुम्हारे ही हाथों बजती है।
हे जननी
हम डरे नहीं
जिन लोगों ने तुम्हारी जमीन पर
अपने क्रूर पंजे पसारे हैं
हम उनकी गर्दन पकड़कर सरहद के पार खदेड़ देंगे।
हम जीवन को अपनी तरह से सजा रहे थे ...
सजाते रहेंगे।  read more »

छत्तीसगढ़ी लोककलाओं की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

- आचार्य डॉ. महेशचन्द्र शर्मा

नृत्य शब्द से ही 'नाच' और 'नाचा' शब्द बने हैं। भरथरी, पण्डवानी, हास्य-प्रहसन और गम्मत-नाचा आदि छत्तीसगढ़ी लोक कलाओं की सरितायें भी हमारी शास्त्रीय विधाओं के हिमगिरि से ही निकली हैं।

वे आज भी वहीं से जीवन रस ग्रहण कर रही हैं। और ऐसा होना स्वाभाविक भी है। भरतमुनि के सिध्दान्तों के अनुरुप विश्व की प्रथम नाटयशाला छत्तीसगढ़ के रामगिरि (अब रामगढ़) में ही है। इसी पावनस्थली को भगवती सीता के पुनीत स्नानों ने पवित्रतम किया है। प्रभुराम ने चरण कमल धरे इसी धरती पर।

विश्व के प्रथम बाल कलाकार लव-कुशों ने रामकथा का नाटयमंचीय गायन इसी धरती पर किया। वे नाटयसाहित्य के इतिहास में 'कुशीलवौ' के रूप में प्रसिध्द हुये।

रूपक काव्य में यही सम्बोधन ऐसे कलाकारों को दिया जाता रहा है। महाकवि कालिदास, महान् गद्यकार बाणभट्ट और महान् नाटककार भवभूति को यहीं श्रेष्ठ रचना की प्रेरणा मिली। इसी नाटयशाला में इनको महती नाटयकृतियों के मंचन का अवसर मिला। महर्षि वाल्मीकि का एक आश्रम (तुरतुरिया) भी इसी प्रदेश की शोभा है। नटराज शिव और नटनागर ब्रजकिशोर श्रीकृष्ण और उनकी कला विधाओं का विशेष प्रभाव यहाँ पर है।  read more »

दिव्य स्मृति पुरस्कार

सागर। पिछले दिनों यहां अखिल भारतीय अंबिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों की घोषणा की गई। पुरस्कार के लिए कुल123 पुस्तकें प्राप्त हुई थीं। समारोह के अध्यक्ष शिवकुमार श्रीवास्तव ने इस अवसर पर कहा - दिव्य पुरस्कारों ने सागर जिले को केंद्रीय स्थान दियाला है।

पुरस्कार के रूप में भोपाल की कथाकार उर्मिला शिरीष के कथा संग्रह निर्वासन केलिए पांच हजार रुपए, इंदौर की कवयित्री रश्मि रमानी को बीते हुए दिन तथा दिल्ली के निबंधका पवन चौधरी मनमौजी को उनकी आत्म कथा छोटे हाथ बड़े हाथ के लिए इक्कीस सौ रूपए और चंद्रपुर की डॉ. बानो सरताज को बालकृति तीस एकांकी नाटक के लिए ग्यारह सौ रुपए प्रदान किए गए। इसके अलावा चैबीस अन्य रचनाकारों को भी पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर समारोह के संयोजक जगदीश किंजल्क उपस्थित रहे।

काफका का योजेफ क. जहाँ नहीं पहुँचा

- अमृत मेहता

तब मैं जनीवा में सिर्फ कुछ घंटों के लिए था। 11 साल पहले। स्विस रेल का स्विस कार्ड था मेरे पास, प्रथम श्रेणी में 8 दिन के लिए रेल, नाव, बस, ट्राम की यात्रा उसी में आ जाती थी। बेर्न के निकटस्थ नगर जोलोतुर्न के वार्षिक साहित्य-उत्सव पर आये कुछ विशेष मेहमानों के लिए नि:शुल्क।

कुछ दिन वास ज्यूरिख में था, शेष समय फे्रंचभाषी लुजान में। जनीवा भी तो फ्रेंचभाषी था। परंतु उस मेघाछन्न एक दिन में किसी से वार्तालाप की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ी थी। स्विटजरलैंड के उत्तर में तथा पूर्व में जर्मन बोली जाती है। दक्षिण तथा पश्चिम में फ्रेंच। दक्षिण पूर्व में इतालवी भी बोली जाती है। मैं तो तब भी जर्मन ही जानता था और अब भी। उत्तर के जर्मन भाषी चतुर हैं।

हर स्विस-जर्मन जानता है कि देश के राजस्व का एक बड़ा भाग पर्यटन से मिलता है अत: वे अंग्रेजी भी सीखे हैं, हिंदुस्तानी जर्मन में भी बात करे तो अंग्रोजी बोल देते हैं। सयाने बिजनेसमेन हैं। दक्षिण तथा पश्चिम के फ्रेंचभाषियों को अपनी भाषा पर अभिमान है, अंग्रोजी भी नहीं सीखते, जर्मन भी नहीं सीखते। इतालवी, वो कौन सी भाषा है?

तो 1995 में एक दिन जनीवा में। लुजान से जनीवा एक घंटे का रास्ता भी नहीं है। जनीवा झील के किनारे-किनारे ही सरपट दौड़ती है गाड़ी। फील के उस पार फ्रांस है। इधर से ही कारें, मनुष्य नजर आते हैं। वैसे जनीवा का एक भाग, छोटा सा हिस्सा, फ्रांस में भी है। यहाँ से वहाँ लोग ऐसे ही निकल जाते हैं। वैसे जनीवा का एक भाग, छोटा सा हिस्सा, फ्रांस में भी है।

यहाँ से वहाँ लोग ऐसे ही निकल जाते हैं, सीमाचौकी पर रोकटोक कम ही है। मैं फ्रांस वाले हिस्से में नहीं गया। वैसे सुना था कि कालों और कम गोरों को बिना विजा पकड़ लेते थे, नहीं घुसने देते थे 'शेंगन' देशों के अभेद्य किले में।

जनीवा की दो ही चीजें याद थीं। एक तुर्क होटल तथा जनीवा झील का असीम विस्तार। 500 किलोमीटर लंबी, 300 मीटर गहरी झील किसी भी जगह 10 किलोमीटर से कम चौड़ी नहीं थी। नीली, स्वच्छ, झिलमिलाते सूरज के नीचे अनेक रंग बदलती, मेघ छाये हों तो कुछ और ही छटा होती थी। कभी उदास, कभी किसी दार्शनिक की तरह गहरी सोच में, शांत।

झील के एकदम मध्य से हो कर रयोने नदी बह रही है। ऊपर से शांत दिखने वाली झील के एकदम मध्य में तैरता कभी अचानक गायब भी हो सकता है। नदी अपने संग लिये जाती है। झील का तापमान वातावरण के तापमान के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। परन्तु गरम मौसम में भी रयोने नदी के आसपास की जलसतह बर्फीली ठंडी होती है।  read more »

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