बड़ा कमीशन

बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की सहायता हेतु एक नेता अपनी झोली फैलाकर चन्दा जुटा रहा था, लोगों ने खूब चन्दा दिया जब नेता की झोली नोटों से भर गई तो वह एक पार्क में जाकर नोट गिनने लगा तभी नेता का एक चमचा भिखारी के भेष में आया और एक ऑंख मारकर कुछ गिड़गिड़ाने लगा ........

नेता ने एक पल अपने नजरे उठाकर देखी तन्हा पार्क में उन दोनों के सिवाय कोई न था ...... तभी उसने चन्दे की रकम में से सौ-सौ के तीस नोट निकाल कर देते हुए कहा'इसमें से दस रुपये तुम अपनी' 'ओवर एक्टिंग और कमीशन' के रख लेना बाकी 2990 मेरे कार्यालय में गांधीजी की तस्वीर के पीछे रख देना .........

रिश्वत खोर

जंगल का एक शेर कुछ अजीब तरह का आदम खोर बन गया था वह दिन के उजाले में बड़े-बड़े सरकारी दफ्तरों में जा घुसता और वहाँ सेवारत लोगों को बारी-बारी से सूंघता ......... फिर किसी एक को अपना ग्रास बना लेता। यह क्रम कई दिनों से चल रहा था एक दिन खरगोश ने पूछा'महाराज। सुना है, आप कुछ खास किस्म का शिकार करते हैं इस खास किस्म का राज जरा मुझे भी तो बताओ ?

शेर दुम हिलाकर बोलाजो काम आज के नेता और पुलिस नहीं कर सकते ...... वह काम मैं अपनी बिरादरी के कलंक लगा के कर रहा हूं ......... यानी रिश्वत खोर लोगों का खून चूसकर'रिश्वत रोग' जड़ से खत्म करने का प्रयास कर रहा हूँ ......।

आलोचना के क्षितिज पर अज्ञेय से अरुण कमल .......

- उत्‍पल बैनजी

'अज्ञेय से अरुण कमल तक' डॉ संतोष कुमार तिवारी का वृहत आलोचना ग्रंथ (दो खण्डों में) है, जिसमें पिछली अर्ध्दशती के महत्वपूर्ण तथा चर्चित कवियों के रचनाकर्म पर गंभीर समालोचनात्मक आकलन है।

लगभग सवा आठ सौ पृष्ठों के इस ग्रंथ में डॉ. तिवारी ने नई कविता, सृजन और समीक्षा पर अपने सारगर्भित विचार रखने के साथ ही साथ अज्ञेय, नागार्जुन, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजा कुमार माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, दुष्यन्त कुमार, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, चन्द्रकान्त देवताले, भगवत रावत, ऋतुराज, अशोक वाजपेयी, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश तथा अरुण कमल की रचनाओं पर एक सुधी पाठक तथा कविता के रसज्ञ एवं मर्मज्ञ आलोचक के रूप में अपनी विस्तृत बेलाग गंभीर टिप्पणियाँ की हैं।

इनके अलावा पुराने तथा नए लगभग चालीस कवियों के रचनाकर्म पर डॉ. तिवारी ने अपने सूक्ष्म दृष्टि से उन रचनात्मक तत्वों को उद्धाटित किया है, जिन्हें समीक्षा की बँधी-बँधाई लीक पीटने वाले पेशेवर समीक्षक अमूमन देख नहीं पाते। इस तरह लगभग 62 कवियों की रचनात्मकता पर गंभीर हस्तक्षेप करता है यह ग्रंथ अपने आप में अनूठा है।  read more »

रामेश्वर वैष्णव के गीतों की सांगीतिकता

- प्रो. चित्तरंजनकर

रामेश्वर वैष्णव का संस्कार मूलतह्र: संगीतिका है, गीत तो उस का प्रकटन है । यह तथ्य उनके सभी गीतों का स्थाई भाव है, जिसे उनके प्रस्तुतीकरण में भली-भांति महसूस किया जा सकता है । ऐसी स्थिति में गीत और संगीत की शास्त्रीय विवेचना करना संभव नहीं प्रतीत होता, क्योंकि उनमें वह ह्र'लय' होती है, जो गीत और संगीत ही क्यों, जीवन के लिए आवश्यक होती है

जब रामेश्वर वैष्णव कहते हैं - ह्र'जितनी खरी दुपहरी होगी/छाया उतनी गहरी होगी... चिड़िया कैसे गूंगी होगी/यह दुनिया की बहरी होगी', तो यहाँ शब्दों के अंतस् में संगीत उसी तरह अपनी विद्यमानता प्रमाणित करता है, जिस तरह दीखने में सूखी नदी, जिसकी रेत को कुरेदने पर जल ही जल होता है ।

गीत के ऑंसू में मूलतह्र: विद्यमान यह संगीत बाह्य उपकरणों की अपेक्षा आंतरिक भावों का प्रस्फुटन होता है, इसलिए यह शब्दों से ही नहीं, ह्र'मौन' से भी प्रकट होता है, वैेसे ही जैसे बंद ऑंखों से वह सब दृश्य हो जाता है, जो खुली ऑंखों से संभव नहीं होता । उनका एक छत्तीसगढ़ी गीत व्यंग्य में करुणा और करुणा में व्यंग्य को इस तरह उभारता है कि श्रोता/पाठक अनायास अभिभूत हो जाता है-

बने करे राम मोला अंधरा बनाए ।
मोर जिनगी माँ सुरुज न उगाए ।

व्यावसायिक कहे जाने वाले विज्ञापनों से भी वैष्णव प्रेरणा लेने से नहीं चूकते और ऐसी धुन बना देते हैं कि संगीतविद् हतप्रभ रह जाते हैं । उक्त छत्तीसगढ़ी गीत का धुन उन्होंने ऐसे ही ह्र'निरमा डिटर्जेंट टिकिया, उस की झाग ने जादू कर दिया' के ह्र'झाग' शब्द पर कलात्मक एवं प्रभावशाली धुन को पकड़ा और एक नई रचना प्रस्तुत कर दी । भाव के साथ-साथ सुरों का उतार-चढ़ाव सोने में सुहागा हो जाता है ।  read more »

मां का दूध

घने जंगल में एक कुदरती झरना था, उसके बारे में किवदंती थी'कोई कुरूप युवती निर्वस्त्र स्नान करे तो वह खूबसुरत बन सकती है।

ऐसे ही एक बार कोई आदिवासी कुरुप युवती निर्वस्त्र स्नान कर रही थी, तभी एक हष्ट-पुष्ट युवक आया और एक टक युवती ने मुँह के आगे से अपने सिर के लम्बे-लम्बे गीले बालों को दोनों हाथों से ऊपर करे तो सामने खड़े युवक पर नजर पड़ी युवक उसे एक टक घेर जा रहा था, तभी उसने विनम्र स्वर में कहामुझे इस तरह क्यों घूर रहे हो? क्या कभी बचपन में तुमने अपनी माँ का दूध नही पिया ?

बिलासपुर (हिमाचल) के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे छात्र

हिमाचल आशा शैली का बिलासपुर सतलुज नदी के किनारे पर बसा हुआ है। स्वतंत्रतासंग्राम के समय यहाँ पर राजा आनन्दचंद का अधिपत्य था। जो अत्यन्त क्रूर और निर्दयी शासक सिध्द हुआ था। आजादी की लहर के चलते लोग इस राजा के शासन से भी मुक्ति पाने को उतावले हो रहे थे। ये उस समय की बात है जब कि बिलासपुर में 'प्रजामण्डल' का नाम तक नहीं था। हाँ ! भूमिगत गतिविधियाँ अवश्य थीं। समय था-द्वितीय महायुद्ध का अंत तथा नेताजी सुभाष चन्द्रबोस की आजादहिन्द फौज पर देशद्रोह का मुकदमा (1945)

आजाद हिन्द फौज के उद्धोष- ''जै हिन्द'' के नारे ने उस समय के युवकों के दिलों-दिमाग पर गहरा असर डाला था। उनकी देश-भक्ति तथा बहादुरी ने नौजवानों में नया जोश पैदा कर किया था। और जब देश-द्रोह के मुकदमे को लड़ने के लिए भोलाभाई देसाई के साथ स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वकालती-चोला पहना तो बिलासपुर के विद्यार्थियों ने भी उनके समर्थन में कुछ करने की ठानी।

(उन दिनों रतनलाल उपध्याय नवीं कक्षा में तथा स्व. रमेश चंद्र जी (स्वतंत्रता सेनानी) दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। उस समय हर रविवार को प्रात: 8 बजे सभी अधिकारी, प्रमुख नागरिक तथा सभी ''होस्टल'' के विद्यार्थियों को होस्टल में रहना आवश्यक था) तथा लड़कियों को सरकारी मन्दिर श्रीगणेश जी में जाना आवश्यक था ! उन सभाओं में राजा साहिब (उनकी अनुपस्थिति में उनकी बेटी) अपनी इच्छानुसार कभी 10 बजे तो कभी इसके बाद आते थे तथा स्वामी श्री तुलसी राम जी के प्रवचन के बाद-राजा साहिब के आशीर्वाद के बाद ही सभा समाप्त होती थी।  read more »

कथा साहित्य के मसीहा थे गुलेरी

- डॉ. प्रत्युष गुलेरी

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसे अकेले कथा लेखक थे जिन्होंने मात्र तीन कहानियाँ लिखकर कथा साहित्य को नई दिशा और आयाम प्रदान किये। गुलेरी जी की 'उसने कहा था' कहानी आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में यह चर्चित और आकर्षण का केन्द्र थी।

अगर गुलेरी जी का नाम हटाकर इसे आज भी किसी पत्र-पत्रिका में छाप दिया जाए तो आज की परिवर्तित कहानी की टेकनीक में सहज फिट हो जाएगी। यही इस कहानी की अमरता का एक खास गुण है।

'सुखमय जीवन' बुध्दू का कांटा और 'उसने कहा था' के अतिरिक्त नए शोधकार्यों के प्रकाश में आने के फलस्वरुप वे एक उत्कृष्ट कोटि के निबंध लेखक प्रखर समालोचक, उद्भट भाषाशास्त्री, निर्भिक पत्रकार एवं सफल कवि सिध्द होते हैं।

यह स्वयं में चौंकाने वाला विषय है कि आजकल कई विद्वान गुलेरी जी के कतिपय निबन्धों को कहानियों का नाम देकर उन्हें पत्र पत्रिकाओं में छापकर गुलेरी जी को नहीं अपितु स्वयं स्थापित होने का दम्भ भर रहे हैं जो अच्छा नहीं।

अपने ऐसे कथात्मक पुट लिए निबन्धों को गुलेरी जी ने कभी कहीं भी कहानी नहीं कहा है। उन्होंने अपने समय में उन्हें निबन्ध विधा में रखकर छापा है, टिप्पणियों के रूप में लिखा है। यही नहीं गुलेरी जी की कहानी 'बुध्दू का कांटा' को 'पनघट' नाम देकर व्यर्थ उछाला गया।  read more »

साहित्य वैभव की समीक्षा

'साहित्य वैभव' हाथ में आते ही इसमें अन्तरनिहित विषय सामग्रियों का विहंगावलोकन किया।

बख्शी जी पर केंद्रित साहित्य वैभव का अंक रुचिकर लगा। वैसे पदुम लाल पुन्नालाल बख्शीजी की साहित्यिक सेवाओं को बांध पाना कठिन है तदपि प्रयास सराहनीय है। बख्शीजी के जीवन के व्यवहारिक पक्ष के अन्तर प्रेष्टीय स्वरूप का उल्लेख अत्यंत न्यून हो पाया है, यह बार-बार खटकता है।

पत्रिका का बाह्य कलेवर अच्छा लगा। संपादकीय विषय को समूचे विषय को बांधने वाली होनी चाहिए थी। ऐसा मैं मानता हूँ। संपादकीय को पढ़ कर पूरी पत्रिका की अनुभूति होनी चाहिए। किन्तु संपादकीय में ऐसा कुछ नहीं लगा। साहित्य वैभव के आगामी अंक के प्रकाशन होने के अवसर पर कथित ध्यान देना चाहिए।

- राजेन्द्र विश्वकर्मा राज, भट्ठापारा, अम्बिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़

बृजलाल द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान

इंदौर के डा. व्यास को
वीणा के श्रेष्ठ संपादन के

रायपुर । पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान 2006 देश की सर्वाधिक प्राचीन मासिक पत्रिका मवीणाम के संपादक डॉ. श्यामसुंदर व्यास को प्रदान किया गया है । अक्टूबर 1927 से इंदौर से सतत प्रकाशित होने वाली मवीणाम के80 ख़ वर्ष के साहित्यिक योगदान के लिए इस सम्मान के लिए चुना गया है। जिसके डॉ. व्यास पिछले 35 सालों से संपादक हैं ।

पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समिति की संयोजिका श्रीमती भूमिका द्विवेदी ने बताया कि हिंदी की स्वस्थ पत्रकारिता को समादृत करने के उद्देश्य से इस पुरस्कार की शुरूआत की गई है । फैजाबाद में जन्मे पं. बृजलाल द्विवेदी साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे तथा आजीवन लोकमंगल के कार्यों में रत रहे । उनकी पावन स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने यह सम्मान स्थापित किया गया है ।  read more »

जरुर जाऊँगा कलकत्ता

- जीतेन्द्र श्रीवास्तव

अभी और कितनी दूर है कलकत्ता
वही कलकत्ता
जहाँ पहुंचे थे कभी अपने मिर्जा गालिब
और लौटे थे
जेहन में आधुनिकता लेकर
मैंने कितनी-कितनी बार दुहराया है
वह शेर
किसी सबक की तरह
जिसमें दुविधा के बीच
जीवन की राह तलाशता है शायर
वहाँ सवाल ईमान और कुफ्र का नहीं
वहाँ सवाल धर्मी और विधर्मी का नहीं
वहाँ सवाल एक नयी रोशनी का है
गालिब की यात्रा के सैकड़ों साल बाद
मैं हिन्दी का एक अदना सा कवि
जा रहा हूँ कलकत्ता
मन में गहरी बेचैनी है
इधर बदल गये हैं हमारे शहर
वहाँ अदृश्य हो रहे हैं आत्मा के वृक्ष
अब कोई ऑंधी नहीं आती
जो उड़ा दे भ्रम की चादर
यह जादुई विज्ञापनों का समय है ।
यह विस्मरण का समय है
इस समय रिश्तों पर बात करना
प्रागैतिहासिक काल पर बात करने जैस हो गया है ।
हमारे शहर बदल गये हैं
कलकत्ता भी बदल गया होगा
पर अभी कितनी दूर है वह
बैठे-बैठे पिरा रही है कमर
बढ़ती जा रही है हसरत
कितना समय लगा होगा गालिब को
वहाँ पहुँचने में महज देह नहीं
आत्मा भी दुखी होगी उनकी
उनके लिए कलकत्ता महज एक शहर नहीं था
उनकी यात्रा किसी सैलानी की यात्रा थी
जब हम देखते हैं किसी शहर को
वह शहर भी देखता है हमको कलकत्ते ने देखा होगा हमारे महाकवि को
उसके आंसुओं को
उसकी उदासी को
उसके दुख को
क्या कलकत्ते ने देखा होगा
हमारे महाकवि की आत्मा को
उसके भीतर बहती अजस्र कविता को ?
मैं कलकत्ते में
कैसे पहचानूंगा उस पत्थर को
जिस पर समय से दो हाथ करता  read more »

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