- अशोक रहाटगांवकर
डॉक्टर चित्तरंजन कर की नई पुस्तक च्व्यक्तित्व निर्माण में भाषा की भूमिका अभी हाल ही में पढ़ने को मिली। उन्होंने इस पुस्तक को में भाषा को आधार मान कर कुल अठारह तत्व बताए हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने के लिए आवश्यक एवं पर्याप्त हैं। बहुत दिनों के पश्चात ऐसी पुस्तक पढ़ने को मिली है। यह पुस्तक डॉ. कर के नाम के अनुरूप चित्त वेधक है। वैसे तो डॉ. कर मूलत: भाषा विज्ञान के प्राध्यापक हैं, परंतु हिंदी और अंग्रोी का पर्याप्त ज्ञान भी इस पुस्तक में देखने को मिलता है। इस पुस्तक का मुखपृष्ठ पर प्रकाशित चित्र स्वयं व्यक्तित्व का बखान करता है।
व्यक्ति की सुंदरता का आभास उसके व्यक्तित्व से ही होता है। काया गोरी हो या काली, आकृति उभरी हुई हो या साधारण जब तक व्यक्तित्व नहीं निखरता उसका आकर्षण पता नहीं लगता। किसी भी इंसान का परिधान यदि ठीक न हो तो उसका व्यक्तित्व उठ कर नहीं दिखता। इक्कीसवीं सदी में कदाचित यह धारणा ठीक भी हो सकती है परन्तु कुछ उदाहण इसे झुठलाने के लिए पर्याप्त साबित हो सकते हैं। जैसे महात्मा गांधी का परिधान क्या था - एक लंगोटी, स्वामी विवेकानंद का परिधान क्या था - एक संन्यासी का चोला। परंतु उनकी ओजस्वी वाणी ने, उनकी भाषा ने हमारे बीच अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ी है।
व्यक्तित्व निर्माण में भाषा की भूमिका को रेखांकित करने वाली यह पुस्तक एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करने में काफी सहायक सिध्द होगी। ऐसे हस्तांतरणों में साहित्यिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, आर्थिक, वाणिज्यिक, सामाजिक एवं धार्मिक विकास के साथ-साथ विश्वबंधुत्व की कल्पना भी साकार करने में सफल प्रतीत होते हैं।
डॉ. कर ने जिस अंग्रोजी कहावत का जिक्र इस पुस्तक में किया है वह बहुत सोच समझ कर किया है। उनका यह मानना कि प्रतिभा जन्मजात नहीं बल्कि साधना जन्य होती है। क्योंकि निन्यानबे प्रतिशत परिश्रम और एक प्रतिशत प्रेरणा का फार्मूला उपयुक्त माना गया है।
भाषा का महत्व तो है ही, परंतु ये तत्व यदि नहीं रहेंगे तो व्यक्ति प्रभावी नहीं लगेगा। जिस प्रकार भाषा का ज्ञान हो कर भी प्रस्तुतिकरण के समय ये गुण न रहे तो भाषा का प्रभाव भी घटा घटा सा लगने लगता है। read more »