बदलते दस्तूरों से रू-ब-रू कराती गजलें

अब तक दो गीत-संग्रह और तीन कविता-संग्रह हिन्दी साहित्य को दे चुके परिचित कवि और 'सम्यक्' पत्रिका के सुधी सम्पादक मदनमोहन उपेन्द्र के पहले ंगाल-संग्रह का नाम है 'बदल गये दस्तूर' जिसमें उनके विगत तीन दशकों के लेखन में से चयनित साठ गालें संगृहीत हैं।

जैसा कि शीर्षक से ही ध्वनित है, संग्रह की अधिसंख्यक गजलों में आज के जीवन की अपाधापी, बदलते सामाजिक परिवेश, गिरते हुए जीवन मूल्य, गाँवों की कषैली जिन्दगी, आदमी के चारित्रिक पतन और बिखरते पारिवारिक सम्बन्धों को अभिव्यक्ति दी गयी है।

यों विगत दशकों में स्वयं गाल के मिजाज में भी काफी इस परिवर्तन आया है। जो गजल पहले राजों-रजवाजड़ों या बाजारू कोठों की ही शोभा बढाया करती थी, वह अब आम आदमी के दु:ख-दर्द की साथी बनने में अधिक सुकून महसूस करती है। इस बदलाव को हिन्दी के विभिन्न गालकारों ने अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त किया है। स्वयं उपेन्द्र के शब्दों में ..........

राजमहलों से उतर आयी गाल
झोंपड़ी के बीच बिरमायी गाल
आशिकों माशूक की बातें नहीं
प्रश् रोटी का उठा लायी गाल  read more »

महानगरों की क्रूर जिंदगी की त्रासदी है ''अनकहा-सच''

- अशोक सिंह ठाकुर

साहित्य श्री एवं श्रेष्ठ साधना से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री नलिनी शर्मा जी हिन्दी साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं ऍंग्रोी साहित्य में भी इनकी पकड़ अच्छी है ऍंग्रो पत्र-पत्रिकाओं इनकी रचनाएँ प्रकाशित होते रहती है। अभी तक इनकी इस उपन्यास को छोड़ पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

' अनकहा सच' उपन्यास नलिनी जी की नवीनतम कृति है। इस उपन्यास की भूमिका देश के प्रसिध्द कथाकार श्री कमलेश्वर जी ने लिखा है । यह उपन्यास अपने समय के सच को सामने करती एक उत्कृष्ठ कृति है। लेखिका का यह प्रथम उपन्यास होते हुए भी उनमें परिपक्वता है, उनके गंभीर चिंतन अध्ययन की गहराई को भापना दुरुह है। संपूर्ण उपन्यास में इतने छोटे-छोटे सुंदर संवाद है, जो हृदय को छू जाते हैं।

इस उपन्यास में नलिनी जी विशेष रूप से इसलिए प्रभावित करती हैं कि इन्होंने मानव के अंतरंग संबंधों को चित्रित ही नहीं किया वरन् स्त्री-पुरुष की सूक्ष्म अनुभूतियाँ को उभारने की पूरी कोशिश की है।

'अनकहा सच' के पात्र उच्च मध्यम वर्गीय समाज के भीतर से जूझते हुए पात्र हैं। शीर्ष अवस्थी उर्फ विद्रोही जी निकेष, समग्र, चंचल, सरू, नवीन सेठिया, आरती, ऋचा जैसे पात्र इस समाज के चिर-परिचित चेहरे हैं। लेखिका ने परिवार के विघटन के दर्द को और ग्लैमर की चकाचौंध के दुष्परिणाम को बड़ी बखूबी से खुश है।  read more »

कुछ रोशन दिये, अनुभूतियों के

- डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

पुस्तक का नाम - सुनो ओ, नन्हे दिये (गद्य गीत)
प्रकाशक का नाम - कविसभा, विश्वास नगर, शाहदरा दिल्ली
कवयित्री - डॉ. शैल रस्तोगी
पृष्ठ संख्या - 80, मूल्य रुपए 100 मात्र

डॉ. श्रीमती शैल रस्तोगी के पास कुछ रोशन दिये हैं अनुभूतियों के। उनसे झर रहा है बूंद बूंद अमृत प्रकाश। इसी अमृत प्रकाश को उन्होंने सुनो ओ, नन्हे दिये में अपने पाठकों को बाँट कर चारों ओर छाए सघन अंधकार को कुछ कम करने का प्रयत्न किया है।

सुनो ओ, नन्हे दिये गद्य गीतों का एक सुन्दर वृन्द है जिसमें अनेक स्वर हैं और हर स्वर अपने एक गीत प्रस्तुत करता है। इन गीतों में भावनाओं और विचारों का एक अद्भुत समन्वय है। इसमें जहाँ एक ओर भावनात्मक विह्वलता है वहीं दूसरी ओर चिंतन के विविध रंगों का भी इनमें संतुलित समावेश हुआ है।

एक समय था जब दिनेश नंदिनी डालमिया अपने गद्य गीतों के एक जानी-पहचानी हस्ताक्षर थीं। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी कुछ गद्य गीत लिखे थे और उनकी भी एक अलग पहचान बनी थी। शैल रस्तोगी इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं जिन्होंने अपने अग्रजों की पाती को न केवल सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया है, बल्कि उसे आगे बढ़ाने में भी मदद की है।

रस्तोगी जी के गद्य गीतों में, जैसा कि कि कोई भी सामान्य पाठक अनुमान लगा सकता है, अनेक स्वर हैं। इनमें कहीं करुणा का स्वर है तो कहीं प्रार्थना का, कहीं समर्पण का स्वर है तो कहीं अस्मिता का, किंतु इन सब स्वरों से ऊपर जो केंद्रीय स्वर है वह विश्वास और आस्था का स्वर है।  read more »

मिला न वृंदावन

- मधुसूदन साहा

मिला न वृंदावन के साठ सरल गीतों को दो बार पढ़ गया तो लगा कि इस बढ़ती हुई बाजार संस्कृति में जब मानवीय मूल्यों का इस कदर विघटन हो गया है तो मन को वृंदावन कहाँ मिलेगा। यह एक स्वत: सिध्द सत्य है कि जब किसी संवेदनशील व्यक्ति को जीव भर खाक छानने के बावजूद अपना वांछित वृंदावन नहीं मिलता है तो उसकी पीड़ा का प्रत्येक क्षण गीत सृजन के लिए प्रस्तुत हो जाता है।

सत्य: प्रकाशित यह गीत संकलन कवि द्वारा जीवन भर तलाशने के बाद वृंदावन न मिलने वाली पीड़ाओं का संकलन है। संग्रह के साठ गीतों में कवि-मन की अनेक प्रतीतियाँ हैं।

जब-जब मन में भावना का कोई नन्हा शिशु किलकारी मार उठता, कवि के होठों से गीत फूट पड़ता, तब मन का रेशा-रेशा चंदन-सा महकने लगता और सांसों में मधुर-मदभरी घुँघरू बजने लगती। किन्तु यह दुनिया इसकी इजाजत भी नहीं देती।

अच्छी कद-काठी वाले जिंदगी भर दर-दर की ठोकरें खाते रहते हैं और बौने जी को कुर्सी मिल जाती है। जो कभी कोठे पर जाते थे आज संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं। जो हमेशा नैतिकता की ऐसी-तैसी करते हैं वे ही उपदेश की मुद्रा में आकर संस्कार और संस्कृति पर व्याख्यान देने लगते हैं। अपने फायदे के लिए संविधान को ताक पर रख कर अपने खुद के कायदे-कानून बना लेते हैं।

फलस्वरूप अर्थहीन से लगते अब तो। नैतिकता के सब पैमाने। होठों के बीच सिसकते रहते। दुख-दर्दों से भरे तराने। ऐसी ही नैतिकता के हाथों हमारी परम्परा और संस्कृति का चीर हरण होता आया है और आज यह पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। लोग आपस में फूल देना भूलकर शूल चुभोने में लग गए हैं। आखिर जेब में पत्थर ले कर घूमने वाले लोगों से सद्भाव और सौहार्द्र की उम्मीद कोई करे कैसे ?

अब न तो पहले जैसा गाँव रहा और पहले जैसी सोच। सब कुछेक-एक कर बदल चुका है। शह के लफड़े गाँव में भी शुरू हो गए हैं। यहाँ भी चाँद सरीखे उजले तन के के भीतर काले मन ने सर्पों-सा डँसना शुरू कर दिया है। लोग गमले में नागफनियों उगाने लगे हैं और चीनी नें लपेटकर जहर की गोलियाँ बाँटने लगे हैं। ऐसे माहौल में चुभन की चीख और मौत के सिवा क्या नसीब होगा?  read more »

व्यक्तित्व निर्माण में भाषा की भूमिका

- अशोक रहाटगांवकर

डॉक्टर चित्तरंजन कर की नई पुस्तक च्व्यक्तित्व निर्माण में भाषा की भूमिका अभी हाल ही में पढ़ने को मिली। उन्होंने इस पुस्तक को में भाषा को आधार मान कर कुल अठारह तत्व बताए हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने के लिए आवश्यक एवं पर्याप्त हैं। बहुत दिनों के पश्चात ऐसी पुस्तक पढ़ने को मिली है। यह पुस्तक डॉ. कर के नाम के अनुरूप चित्त वेधक है। वैसे तो डॉ. कर मूलत: भाषा विज्ञान के प्राध्यापक हैं, परंतु हिंदी और अंग्रोी का पर्याप्त ज्ञान भी इस पुस्तक में देखने को मिलता है। इस पुस्तक का मुखपृष्ठ पर प्रकाशित चित्र स्वयं व्यक्तित्व का बखान करता है।

व्यक्ति की सुंदरता का आभास उसके व्यक्तित्व से ही होता है। काया गोरी हो या काली, आकृति उभरी हुई हो या साधारण जब तक व्यक्तित्व नहीं निखरता उसका आकर्षण पता नहीं लगता। किसी भी इंसान का परिधान यदि ठीक न हो तो उसका व्यक्तित्व उठ कर नहीं दिखता। इक्कीसवीं सदी में कदाचित यह धारणा ठीक भी हो सकती है परन्तु कुछ उदाहण इसे झुठलाने के लिए पर्याप्त साबित हो सकते हैं। जैसे महात्मा गांधी का परिधान क्या था - एक लंगोटी, स्वामी विवेकानंद का परिधान क्या था - एक संन्यासी का चोला। परंतु उनकी ओजस्वी वाणी ने, उनकी भाषा ने हमारे बीच अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ी है।

व्यक्तित्व निर्माण में भाषा की भूमिका को रेखांकित करने वाली यह पुस्तक एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करने में काफी सहायक सिध्द होगी। ऐसे हस्तांतरणों में साहित्यिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, आर्थिक, वाणिज्यिक, सामाजिक एवं धार्मिक विकास के साथ-साथ विश्वबंधुत्व की कल्पना भी साकार करने में सफल प्रतीत होते हैं।

डॉ. कर ने जिस अंग्रोजी कहावत का जिक्र इस पुस्तक में किया है वह बहुत सोच समझ कर किया है। उनका यह मानना कि प्रतिभा जन्मजात नहीं बल्कि साधना जन्य होती है। क्योंकि निन्यानबे प्रतिशत परिश्रम और एक प्रतिशत प्रेरणा का फार्मूला उपयुक्त माना गया है।

भाषा का महत्व तो है ही, परंतु ये तत्व यदि नहीं रहेंगे तो व्यक्ति प्रभावी नहीं लगेगा। जिस प्रकार भाषा का ज्ञान हो कर भी प्रस्तुतिकरण के समय ये गुण न रहे तो भाषा का प्रभाव भी घटा घटा सा लगने लगता है।  read more »

गजल

हाल दिल का किसा से मत कहिए
इससे अच्छा है आप चुप रहिए।
दिल कभी नेक मशविरा देगा
ऐसे धोखे में आप मत रहिए।
सुख की कीमत अगर समझनी है
ये जरूरी है कुछ तो दुख सहिए।
जिंदगी का यही तंकाा है
वंक्त मुश्किल हो फिर भी खुश रहिए।
आप सबसे जुदा दिखाई दें
कुछ जमाने में इस तरह रहिए।
देख कर लोग फेर लें नारें
सबकी नारों में ऐसे मत गिरिए।
मिल ही जाएगी एक दिन मंजिल
शर्त इतनी है राह खुद चुनिए।

बसेरा हर तरंफ है तीरगी का
मैं कब से मुंताजिर हूँ रोशनी का।

अभी तक ये भरम टूटा नहीं है
समंदर साथ ते देगा तिश्नगी का।

किसी का साथ छूटा तो ये जाना
यहां होता नहीं कोई किसी का।

वो किस उम्मीद पर जिंदा रहेगा
अगर हर ख्वाब टूटे आदमी का।

न जाने कब छुड़ा ले हाथ अपना
भरोसा क्या करें हम जिंदगी गा।

लबों से मुस्कराहट छिन गई है
ये है अंजाम अपनी सादगी का।

- देवमणि पांडेय

कीर्ति वर्ध्दन को हिरदे कविरत्न सम्मान

मुजफ्फरनगर। सुख्यात कवि ए. कीर्ति वर्ध्दन को महिमा प्रकाशन एवं छत्तीसगढ़ शिक्षक साहित्यकार मंच द्वारा उनकी प्रकाशित साहित्यिक कृति च्सच्चाई का परिचय पत्र पर हिरदे कविरत्न सम्मान 2006 द्वारा विभूषित किया गया है।

छत्तीसगढ़ शिक्षक साहित्यकार मंच के अध्यक्ष श्री शिव नारायण देवांगन च्आस ने च्सच्चाई का परिचय पत्र की रचनाओं को सच्चाई का सजीव चित्रण बताते हुए सच्चाई को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने के ए. कीर्तिवर्ध्दन के प्रयासों की सराहना की। श्री च्आस ने बताया कि इस संग्रह में संग्रहित रचनाएँ हर पाठक को पढ़ने एवं सोचने को विवश करती हैं।

विदित हो कि श्री कीर्तिवर्ध्दन के दो काव्य संग्रह च्मेरी उड़ान एवं च्सच्चाई का परिचय पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। गत माह श्री कीर्तिवर्ध्दन को अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश) द्वारा श्री प्रयाग नारायण पाण्डेय स्मृति सम्मान मॉरीशस सरकार के पर्यावरण एवं राष्ट्रीय विकास मंत्री श्री अनिल कुमार बाजू, भारत में मॉरीशस के उच्चायुक्त श्री मुखेश्वर चुन्नी एवं पूर्व सांसद व शिक्षाविद डॉ. रत्नाकर पाण्डेय द्वारा संयुक्त रूप से प्रदान किया गया था।

तमाम खल्क की तंकदीर में संफर ही तो है

समीक्षा-उजाले का सफर : डॉ. डी.एम.मिश्र

हबीब अजमली

शायरी की तमाम विधाओं में गाल का मोंकाम सबसे ऊँचा है। जिस बात को कहने के लिए बड़ी-बड़ी नमें, काव्य और महाकाव्य का भी दामन छोटा पड़ जाता है गाल उसे अपने एक शेर में बड़ी सहजता से ढाल लेती है। गागर में सागर भरना ही गाल का काम है। गाल की मिसाल सिर्फ गाल ही से दी जा सकती है। बंकौल अजमल सुलतानपुरी-

गाल बजाय खुद अपनी मिसाल है अजमल
कोई भी सिनंफे सोंखन हो नहीं गाल का जवाब।

उर्दू में वली दकनी, मीर, गालिब से लेकर जिगर तक सबने गेसू-ए-गाल को इतना संवारा कि इसका जादू दुनिया-ए-अदब में सिर चढ़ कर बोलने लगा। हिंदी साहित्य में भी आज गाल की जमीन बड़ी जरंखेज नार आती है । दुष्यन्त, अदम गोंडवी और कृष्ण मोहन आदि ने गाल को नई दिशा प्रदान की। इस दौरान गाल नए-नए तजुर्बात से दो-चार होती रही और आने वाले जमाने में भी हिंदी और उर्दू में नए-नए अंदाज में गालें कही जाती रहेंगी। फरि भी गाल का कभी न खत्म न होने वाला संफर जारी रहेगा।

शेरो-शायरी की दुनिया में सुलतानपुर किसी परिचय का मोहताज नहीं। याहँ के हिंदी-उर्दू रचनाकारों की एक लम्बी सूची में कवि डॉ. डी.एम.मिश्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। मैंने उन्हें कई मुशायरों, कवि सम्मेलनों और नशिस्तों में सुना है।  read more »

बेटियां

बेटी मन की पीर भुला दे
बेटी जो बस प्रीत जगा दे
बेटी है चंदन की खुशबू
बेटी घर भर को महका दे
बेटे जैसे भटके राही
बेटी सच्ची राह दिखा दे
बेटी है लक्ष्मीबाई - सी
हिम्मत का जो पाठ पढ़ा दे
बेटी क्या है शीतल छैंया,
धरती पर ही स्वर्ग बना दे
बेटी जिसका तन-मन कोमल
जो कोयल-सा गान सुना दे
बेटी जिसको देख समूचा -
घर अपना दुख-दर्द भुला दे
बेटी कभी साा न देती
बेटी घर को सदा सजा दे
बेटी तो इक सुंदर पुल है
बेटी सबका मिलन करा दे
बेटा-बेटी सभी बराबर
बेटी इसका फर्क मिटा दे ।
- गिरीश पंकज

रोशनी

और मलो
और मलो
जितना मलोगे
रोशनी और सांफ होगी
रोशनी एक रंग
या एक तीव्रता की हो
कहाँ संभव  read more »

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