कृत्रिमता

कृत्रिमता की कोख से
नहरें निकलती हैं
नदियाँ नहीं
आविष्कार के मलबे
इकट्ठा होते हैं
खुशियाँ नहीं
जानवरों की दुनिया
हमसे अच्छी है
वह पयार करते हैं
कसमें नहीं खाते
औलादें पैदा करके
बड़ा करते हैं
उम्मीदें नहीं पालते  read more »

उदासीनता

जुबानें बदलती हैं
बात नहीं
जहाँ बहुत घुमा फिरा कर
बोला जाता है
वहाँ ईमानदारी के लिए
जगह नहीं होती
कई रासायनिक क्रियाओं के बाद
एक विस्फोट होता है
और कान पर जूँ नहीं रेंगती
सारी आतुरता अपने पक्ष में होती है  read more »

अवसरवादिता

यह बात आदमियों पर
भी लागू होती है
टूटने तक अपनी शाख से
जुदा नहीं होना चाहिए
और मुक्‍त होने तक
मिट्टी से नाता नहीं तोड़ना चाहिए
लेकिन अवसरवाद
रेत के बीच से निकल गए
और पुजाऊ पत्‍थर बन कर  read more »

विश्व हिंदी सम्मेलन 07 जुलाई न्यूयार्क में ''आनंद शर्मा''

- डॉ. जे.आर. सोनी

रायपुर -29वाँ अंतर्राष्ट्रीय समकालीन साहित्यसम्मेलन 06, लंदन शहर के नेहरू सेंटर के सभागार में दिनांक 08-11.2006 को सम्पन्न हुआ ।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि श्री आनंद शर्मा विदेश राज्य मंत्री अध्यक्ष डॉ. रत्नाकर पाण्डे, पूर्व सांसद एवं सरंक्षक, नई दिल्ली, विशिष्ट अतिथि श्री अतुल खरे निर्देशक नेहरू सेंटर लंदन, श्री राजनारायण गति मॉरीशस, डॉ. कृष्ण कुमार बर्मिघम, डॉ. राजेन्द्र जोशी भोपाल, श्री नारायण कुमार, नई दिल्ली, वैभव कार्तिकेय मुम्बई थे ।

सम्मेलन का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर मुख्य अतिथि एवं अतिथियों द्वारा किया गया ।

समकालीन साहित्य सम्मेलन की 29वां अधिवेशन की समापन समारोह के मुख्य अतिथि श्री आनंद शर्मा विदेश राज्य मंत्री भारत सरकार ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्य भाषा को हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है ।

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषा को मान्यता देने के लिए लगभग 96 देशों का समर्थन चाहिए । सभी मित्रदेशों से संपर्क बनाए हुए हैं । श्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री भी वचन बध्द है । लगभग 140 करोड़ रुपये व्यय होगी । हमारी सरकार आर्थिक, राजनीतिक दबाव बना कर प्रयास कर रही है । अगला विश्व हिंदी सम्मेलन जुलाई 2007 में न्यूयार्क में आयोजित होगी । विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस में सचिव की नियुक्ति 10 नवंबर 06 तक कर दी जाएगी ।  read more »

छत्तीसगढ़ का ऑंगन- पुरखौती मुक्तांगन

छत्तीसगढ़ की संस्कृति और विविधता को जीवंत करने के लिए राजधानी रायपुर से 18 किमी दूर अभनपुर मार्ग पर 200 एकड़ क्षेत्रफल में पर्यटन एवं संस्कृति विभाग द्वारा पुरखौती मुक्तांगन विकसित किया जा रहा है । यह परियोजना वर्तमान में 25 करोड़ की है ।

मुक्तांगन पूरी तरह से छत्तीसगढ़ आदिवासी संस्कृति पर आधारित है । यहाँ उन संस्कृतियों को उकेरा जा रहा है जो विलुप्त हो चुकी हैं । पुरखौती मुक्तांगन संग्रहालय की योजना को मूर्त स्वरूप प्रदान करने की दिशा को वर्ष 2004 से विशेष गति मिली है ।

पुरखौती मुक्तांगन संग्रहालय एक संकल्पना है जिसमें मानव संस्कृति विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य की सांस्कृतिक विकासधारा और अद्यतन स्थिति के कौतूहलमय मनोरंजक जीवन शैली को शैक्षणिक और अनुसंधनात्मक तत्वों के साथ मूल रूप में जीवंत प्रस्तुतिकरण पर केन्द्रित है। यह छत्तीसगढ़ की गौरवशाली परंपरा व संस्कृति का जीवंत प्रमाण होगा । इस मुक्तांगन में विलुप्त होती आदिवासी संस्कृति, साहित्यकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आदमकद प्रतिमाएँ स्थापित की जायेगी । जो देश ही नहीं विश्व में अपनी अलग पहचान बनाएगा।  read more »

लोक का आलोक

संपादक -

डॉ. सुधीर शर्मा

संपादकीय

हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन् भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान के प्रतीक थे । आज छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक, संस्कृति और छत्तीसगढ़ी मनुष्य का जो वैश्विक सम्मान है, वह हबीब तनवीर की बदौलत ही है । वे एक ऐसे शायर, लेखक, नाटयकर्मी, अभिनेता और ईमानदार इन्सान थे जिन्होंने भारत में मरते दम तक सांप्रदायिक सदभाव के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने का प्रण कर लिया था ।

चरणदास चोर और बहादुर कलारिन जैसै अंतरराष्ट्रीय फलक में प्रसिद्ध नाटक पंथी, करमा, ददरिया जैसी लोकधुनों के साथ समूचे विश्व को थिरकने मजबूर कर देते थे । नया थियेटर के माध्यम से उनके अवदान सदैव स्थायी रहेंगे । रायपुर में एक नाटक मैंने बचपन में देखा था- मेचका हांसिस गा । इसका जिक्र कोई समीक्षक नहीं करता, लेकिन मैं इसे छत्तीसगढ़ी की अद्भुत संप्रेषण क्षमता का उदाहरण मानता हँ ।

हबीब तनवीर के जाने के बाद लोक नाटय जगत में शून्य-काल आ गया है । हम इतने वर्षों में छत्तीसगढ़ से एक भी हबीब पैदा नहीं कर पाए । फिदा बाई, गोविन्द निर्मलकर, अनूप पांडेय जैसे कलाकार अब किस रंग-कारखाने से जन्म लेंगे ।  read more »

हबीब तनवीर होने का मतलब

- अशोक वाजपेयी

जो लोग मध्यप्रदेश की अपनी सांस्कृतिक यात्रा से वाकिफ हैं उनको ये बताने की जरूरत नहीं है कि न सिर्फ इस रंगयात्रा में बल्कि संस्कृति यात्रा में हबीब तनवीर की केन्द्रीय भूमिका रही है।

जब भारत भवन में रंगमंडल बनाने की बात हुई थी तो सबसे पहले निर्देशक का प्रस्ताव लेकर मैं उनके पास गया था। उन दिनों उनके लिए ये संभव नहीं था कि वो अपने छत्तीसगढ़ के रंग कलाकारों को छोड़कर यहां आएं या हमारे लिए संभव नहीं था कि भारत भवन में सिर्फ छत्तीसगढ़ी के कलाकारों को लेकर एक रंगमंडल बनाएं। बहरहाल वो नहीं आ सके थे।

मेरा जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ और बाद में सरकारी नौकरी में थोड़े दिन छत्तीसगढ़ में काम करने का मौका मिला, लेकिन मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने छत्तीसगढ़ को वैसा जाना था, जैसा हममें से बहुतों ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ी कलाकारों को हबीब तनवीर के नाटकों में देखकर जानना शुरू किया।

मुझसे कोई सलाह क्यों लेगा। आजकल तो वैसे भी नहीं लेता। लेकिन अगर ले तो इस नए छत्तीसगढ़ राज्य का पहला राज्यपाल हबीब तनवीर को बनाना चाहिए... अगर किसी एक व्यक्ति का नाम लिया जा सकता है पिछले पचास वर्ष में, जिसने छत्तीसगढ़ को उसकी अस्मिता दी है, उसकी पहचान दी है, और छत्तीसगढ़ पर जो जिद करके अड़ा रहा है, और ये जिद सारे संसार में उ्नहें ले गई है तो वह हबीब तनवीर हैं।

एक तो हिन्दी में ही नाटक करना कठिन है, ऐसे में हम कभी नहीं सोचते थे कि एक बोली और वो भी हिन्दी की एक उपबोली में नाटक करें। और उस नाटक को इस हद तक ले जाएं, इतने बरसों तक ले जाएं। बोली जो निपट स्थानीय है और प्रभाव और लक्ष्य जो सार्वभौमिक है।  read more »

थियेटर को नये अर्थों में गढ़ा

- प्रयाग शुक्‍ल

हबीब तनवीर द्वारा अभिनीतनिर्देशित नाटकों में 'मिट्टी की गाड़ी' को एक अन्यतम प्रस्तुति मानता हूँ। शूद्रक के इस नाटक में चारूदत्त जिस धरातल पर कला-कर्म के समझता है और एक सच्चे रसिक और सहृदय की भूमिका अंगीकार करता है उसी धरातल पर हबीब साहब ने अपनी प्रस्तुति की रचना की थी और उसे हर वर्ग के दर्शक के लिए सुबोध, सरस और ग्राह्य बनाया था।

यह प्रस्तुति इस मामले में भी बेजोड़ थी कि इसमें किसी तरह का तामझाम नहीं था - न वेशभूषा का, न मंचसाा का, न अन्य किन्हीं उपकरणों का। अभिनेताओं के भरोसे ही उन्होंने इस नाटक को साकार किया था और लोक-रंग में एक शास्त्रीय रचना को संभव किया था। वे लोक और शास्त्र को अभिन्न मानते थे और दोनों परंपराओं के गहरे रिश्ते से बहुत अच्छी तरह वाकिफ थे। इससे भी आगे बढ़कर वे आधुनिक और समकालीन को लोक और शास्त्र के सुमेल में पिरोने में सफल हुए थे।

अचरज नहीं कि नाटयशास्त्र के पारखी और विशेषज्ञ भी उनकी प्रस्तुतियों के प्रेमी थे, नाटयप्रेमी दर्शक भी और आधुनिक बोध में रचे-पगे बुध्दिजीवी भी। दर्शकों से जो प्रेम उन्हें मिला, उसकी मिसाल मिलनी कुछ मुश्किल ही है।  read more »

भारतीय रंगकर्म से भारतीयता का जाना...

सत्‍यदेव त्रिपाठी

हबीब तनवीर का जाना अनपेक्षित न था, पर 8 जून 2009 को यह खबर एक आघात की तरह लगी। मन से उठी 'हाय' शब्दों में यूँ निकली- 'आज भारतीय रंगकर्म से भारतीयता चली गयी...।'

जी हाँ, उनके हर नाटक को देखते हुए इस बात का गहरा अहसास होता था कि हम सच्चे अर्थों में एक भारतीय नाटक देख रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि हिन्दी के बाकियों में यह अहसास प्राय: नहीं होता या कभी-कभार होता है।

मराठी-बँगला आदि में प्राय: होता है- बहुत कुछ भाषा के कारण भी। किंतु हबीब साहब में हर क्षण महसूस होता है कि 'ये है भारतीय नाटक...' वे संस्कृत के क्लासिक (मृच्छकटिकम, मुद्राराक्षस, वेणीसंहार) करें या शेक्सपीयर (मिड समर नाइट ड्रीम- कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना) करें, आप को नहीं बताया जाये या आपने वह न पढ़ा हो, तो कतई नहीं जान पाएंगे।  read more »

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