कविता

सरगुजिहा देशभक्ति गीत

राजेन्‍द्र प्रसाद वर्मा

धरै लेबो हमन संगी जम्मोच झन मसाल गा,
बैन जाबो हमन संगी, बैरी मन कर काल गा।
आगू माया जम्मोच झन ला, हमन दो सीखाबो,
नई मानही तेकर पाछू, हमूं मन बताबो।
हाथ-गोड़ ला टोयेर-टोयेर, उधेड़ब हम खालगा,
धरै लेबो हमन संगी...
ओहू मन कहीं हमन संगी, काकर पहटा परेन,
अन्नभनियाँ लेहमन संगी, येमन हे लड़ेन,
देश कर सिपाही हवन, फेंकबो हमन जाल गा।  read more »

सरगुजिहा श्रृंगार गीत

राजेन्‍द्र प्रसाद वर्मा

तोर पैरी करतान
मारेल छाती हें बान।
कलेप कलेप रही जाथें,
लईका सियान।
तोर पैरी कर...
नाचा देखे बरे संगी,
तोरेच ठन जाथे।
छुनुर-छुनुर पैरी ला,
ढेरेच ले पतियाथें।
देख-देख के, सुईन-सुईन के,  read more »

गीत

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

क्यों हो गया समय विद्रोही,
क्यों साध सब पंगु हो गए,
मानव की मानव से - शायद-
मानवता पर ही अनबन है।
रिक्त हुई इच्छायें सारी,
या फिर है अपनी लाचारी,
कोई रहा नहीं व्यवहारी।
द्वेष, कपट, छल, छीनाझपटी,  read more »

गमछा

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

यह हिरदेगढ़ का गमछा है।
मजबूती थी पहले तार-तार,
अब हुआ न जाने जार-जार।
कीमत का पाया सदुपयोग,
उपयोगी था, कर पाया नित प्रयोग।
न आह भरी शिकवे ही किये
रगड़ा, धोया, पोंछा, सब काम लिये
यह ग्रीष्म स्वेद षोषक भी है।
सर्दी रक्षक, पोषक भी है।
विद्युत-प्रवाही- योग हुआ।
तीमारदार है यह गमछा,
यानी कि, अच्छा चमचा है।
यह हिरदेगढ़ का गमछा है।  read more »

मोहक क्षण जी लें

डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा

आओ रानी रसघट पी लें
फिर से कुछ मोहक क्षण जी लें
खर्च कटौती आपाधापी
छोड़ो सब खटराग पुराना
हल्दी, तेल, खटाई, दलहन
आसपास संबंध निभाना
चढ़ा गैस पर दूध न उबले
कपड़ा गरम न कीड़े घाएं
थोड़ी देर पास आ बैठो
छोड़ो ये सारी चिन्ताएँ  read more »

अक्सर

अक्सर
सोच से विपरीत
होता है घटित
बहुत कुछ...
अक्सर
कल्पना के केनवास
में नहीं भर पाते
मनचीते
इन्द्रधनुषई रंग...
अक्सर
नहीं पढ़ पाते
अंतिम क्षण तक
नेह की परिभाषा
हमारे चंचल नयन..
अक्सर
काट दिए जाते हैं
ऊड़ान से पूर्व...
हौसले के पंख
अक्सर
मटमैला हो जाता है
ऑंखों से छलक गया
अश्रुजल
गालों पर जमा पसीने  read more »

जमाने लदे भले के

मुक्ताप्रसाद गुप्त

हमने दो जुग इनके देखे, हृदय-पटल पर लेखे।
मटियामेट सबई कर डारो, बेईमान धरे के ॥
भ्रष्टाचार करे मनमाने, नोटन से घर छेके।
न्याय रोंद डारो पैरन में, इनसे सबई तरेके॥
चमचन कौ जे संग देत है, चलत उन्हें नित लैकें।
जाको पतिया जाबें बाकों, करत काम सँग दैकें॥
सही काम कओ नहीं करें जे, ये ते यार ढुरे के।
कर डालो रत्नेश क्रांति अब, लद गए समय भले के॥

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