उस दिन प्रतिदिन की भांति ही सूरज उगा था और प्रतिदिन की भांति ही अम्मा की दिनचर्या भी प्रारंभ हो चुकी थी। परंतु अम्मा के शरीर में वह उत्साह और वह स्फूर्ति दिखाई नहीं दे रही थी जो मैं हमेशा दिखा करती थी। उसे देखने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था माने उसका शरीर मन-मन भर भारी हो गया हो और वह उसे चलाने के लिए ठेल रही हो। फिर भी वह अनमने ढंग से अपनी दिनचर्या निपटा रही थी।
वैसे उसने अपने जीवन में कभी हिम्मत नहीं हारी थी। पति से बिछड़े कई वर्ष हो गए थे, परंतु वह नौकरी करती थी इसलिए उसे जीवन निर्वाह में कोई कठिनाई नहीं हुई थी। फिर भी अकेली होने के कारण अपने दायित्व निर्वाह में कुछ अड़चनें तो आई ही थीं, जिसे उसने आसानी से हटा लिया था। read more »