दीपक जी याने देवेन्द्र दीपक जिनकी मैं इस बात सेसहमत हूं कि संपूर्ण नाम को अक्षर समूह में न रखते हुए अलग-अलग कर उनका अवलोकन, अध्ययन, मनन और अभिव्यक्त करने वाली परिपाटी रचनी चाहिए।
ऐसा नहीं है कि पूर्व में ऐसा न हुआ हो, हुआ अवश्य है और उस परस्तिति में अइधक हुआ है जब कवि या लेख ने अपने नाम के आगे किसी उपनाम की स्थापना की हो। मैं इस बात सेसहमत हूं किबिना उपनाम के भी आप अच्ची रचना कर सकते हैं फिर भी मैं उपनाम का विरोध नहीं करूंगा। दीपक एक भौतिकवस्तु है किन्तु उसकी एक लौ सारे संसार को आलोकित कर सकती है और कर भी रही है। दीपककी एक बाती ने कालान्तर में अनेक बातियों को अपने आप में अपने समूह में सम्मिलित करने का निश्चय कर लिया है।
आगे जहां और भी है कि भांति समई का स्वरूप पा लिया है, अनेक धाराओं से, अनेक बातियों सेचहुं दिशा में अपने आलोक का विस्तार करना वह बखूबी जानती है। मैं समई में लगने वाले प्रकाश के लिए आवश्यक, तेल-घी भी बात करूंगा और कहूंगा इसी सरोवर से प्राप्त ऊर्जा से कवि जो रचता है, वह सब प्रतीक के तौर परदीपक के साथ-साथ चल रहा है। अनेक धाराओं में काम करने के शतप्रति सक्षम वे हैं। इसे पुन: सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। जिसने अमृत स्तल को छू लिया हो वह शिव की सुन्दरता में निवास करने का अधिकारी बन जाता है।
उसे किसी राजपथ की आवश्यकता नहीं होती है, वह अपना स्थान स्वयं बना लेता है, उसे साहित्य वर्षा के लिए किसी इन्द्र की आराधना नहीं करनी पड़ती है अत: किसी भी ऋतु में झंझावातों से अपने आपको बचाने वाला दीपक देवेन्द्र दीपक है। उन्हें आज भी कुछ गैरसामाजिक मान्यता प्राप्त असहमतियों का सामना भी करना पड़ता है, आज भी पड़ रहा है। आज मुझे भरत व्यास की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते -निर्बल से लड़ाई बलवान की-और आगे के भाव को यथार्थ में बदलने वाले दीपक आज भी आलोकित हैं।
अभी तक मैंने उनके नाम के अर्थ पहचानने का प्रयत्न किया है, मैं अब उनके कामों की चर्चा करूंगा। वे जिस भारतीय संस्कारों से होते हुए इस अमृत-कलश तक की यात्रा सम्पन्न की है एक अनूठा और अनुकरणीय तो है ही साथ ही साथ इस बात का भी द्योतक है कि अपने आपको किस प्रकार निष्पक्ष रखाजाय। हम उन परभारतीयता के अतिरिक्त किसी प्रकार का भी लेबलनहीं लगा सकते। मानवीय संवेदनाएं उनका प्रथम चिन्तन है जिससे वे भी सहमत हूं। इसका परीक्षण करने के लिए उनके पास तक जाना होगा। read more »