व्‍यंग्‍य

गुरू-वैभव और श्रीरामकृष्ण

गुरू की महिमा, उनका वैभव और मनुष्य जीवन की मुक्ति साधना के पथ में उनके अमूल्य योगदान का जो वर्णन हमें हिन्दू धर्म में मिलता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। बाकी धर्मों में उनके पैगंबर, ईशारदूत या मसीहाओं का उल्लेख है पर व्यक्तिगत स्तर परजिसप्रकार हम अपने गूरुद्वारा दीक्षित होते हैं, गुरूमंत्र ग्रहण करते हैं और गुरू को साक्षात परमेश्वर समझते हैं वैसे और कहीं भी किसी भी धर्म में नहीं है। संत कबीर ने कहा:

गुरू को मानुष जानते ते नर कहिए अधि एवं गुरू गोविंद दोउ एक हैं,गूरु नारायण रूप हैं, क्योंकि वे गोविंद दियो बताय। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा- ‘बंदउं गुरू पद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि ईश्वर की कृपा न हो तो सच्चे गुरू नहीं मिलते, मिलते हैं तो ढोंगी और ठग।’ कबीर कहते हैं-

’गुरवा तो सस्नामया, पैसा केर पचास।
रामनाम धन बेचिके शिष्य करन की आस।’

जब कबीर के जमाने में भी ऐसे ढोंगी गुरु होते थे तो आज का तो कहना ही क्या।
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुं संत कहइ सब कोई।
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी कलियुग सोइ ज्ञानी सो बिरागी।

आज ी गोस्वामी जी की बात उतनी ही सच है। उच्चकोचि के संत और गुरू दुर्लभ हैं। जिन्होंने ईश्वर की अनुभूति नहीं की दर्शन नहीं किए वे भी बड़ी संख्या में शिष्य बनाए जा रहे हैं। आए दिन दूरदर्शन और समाचार पत्रों में ऐसे ढोंगियों की कथा उजागर होती रहती है।  read more »

सदर दरवाजा

प्रस्तुत पुस्तक को स्रीमती तिवारी ने अपने परमपूज्य पितामह स्व. प्रभवनाथ तिवारी जी को समर्पित किया है। यह उनका दूसरा कहानी संग्रह है। पहला कहानी संग्रह ‘पिंजरा’ गत वष4 प्रकाशित हुआ था जिसे साहित्यकारों ने बड़ी ही सहजता से स्वीकार किया है। इनकी कहानियोंको पढऩे के उपरान्त ऐसा प्रतीत होता है कि मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित ग्रामीण परिवेश की कहानियों की अगली कड़ी के रूप में श्रीमती तिवारी की रचनाएं हिन्दी के वर्तमान काल की सशक्त हस्ताक्षर हैं।

तुलसीदेवी की कहानियों का कथानक हिन्दी क्षेत्र के एक विस्तृत अंचल को समेटे हुए हैं जिसमें गंगा की समरसता पवित्रता से लेकर शिवनाथ की छटा का आप सहज दर्शन कर सकते हैं। ग्रामीण परिवेश ग्रामीण जीवन की सहृदयता उनमुक्त वातावरण के साथ ही वर्तमान जीवन की संकीर्णता छलनापूर्ण उद्देश्य एवं उसके निमित्त कुत्सित उद्योग को आप बड़ी ही सुगमता से परिलक्षित कर सकते हैं। ग्रामीण परिवेश ग्रामीण संस्कृति की झलक तथा उसमें आधुनिकता से उत्सर्जित मानवीय कुंठाओं, झल-प्रपंच तथा टूटते हुए परिवार की संक्रमित भावनाएं निश्चय ही आपके मन को उद्वेलित कर सकती हैं।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर (21वीं सदी के वर्तमान काल में आप बहुत सी पिछली मान्यताओं परिवारों की टूट तथा दिलों के बीच (जनरेशन गैप) बढ़ती दूरी के द्वारा मानवीय भावनाओं के बार-बार होते विस्मयकारी किन्तु सत्य-सत्य विखंडित संबंधों की झांकी अवश्य श्रीमती तिवारी की रचनाओं में देख सकते हैं।  read more »

देवेन्द्र के भी दीपक

दीपक जी याने देवेन्द्र दीपक जिनकी मैं इस बात सेसहमत हूं कि संपूर्ण नाम को अक्षर समूह में न रखते हुए अलग-अलग कर उनका अवलोकन, अध्ययन, मनन और अभिव्यक्त करने वाली परिपाटी रचनी चाहिए।

ऐसा नहीं है कि पूर्व में ऐसा न हुआ हो, हुआ अवश्य है और उस परस्तिति में अइधक हुआ है जब कवि या लेख ने अपने नाम के आगे किसी उपनाम की स्थापना की हो। मैं इस बात सेसहमत हूं किबिना उपनाम के भी आप अच्ची रचना कर सकते हैं फिर भी मैं उपनाम का विरोध नहीं करूंगा। दीपक एक भौतिकवस्तु है किन्तु उसकी एक लौ सारे संसार को आलोकित कर सकती है और कर भी रही है। दीपककी एक बाती ने कालान्तर में अनेक बातियों को अपने आप में अपने समूह में सम्मिलित करने का निश्चय कर लिया है।

आगे जहां और भी है कि भांति समई का स्वरूप पा लिया है, अनेक धाराओं से, अनेक बातियों सेचहुं दिशा में अपने आलोक का विस्तार करना वह बखूबी जानती है। मैं समई में लगने वाले प्रकाश के लिए आवश्यक, तेल-घी भी बात करूंगा और कहूंगा इसी सरोवर से प्राप्त ऊर्जा से कवि जो रचता है, वह सब प्रतीक के तौर परदीपक के साथ-साथ चल रहा है। अनेक धाराओं में काम करने के शतप्रति सक्षम वे हैं। इसे पुन: सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। जिसने अमृत स्तल को छू लिया हो वह शिव की सुन्दरता में निवास करने का अधिकारी बन जाता है।

उसे किसी राजपथ की आवश्यकता नहीं होती है, वह अपना स्थान स्वयं बना लेता है, उसे साहित्य वर्षा के लिए किसी इन्द्र की आराधना नहीं करनी पड़ती है अत: किसी भी ऋतु में झंझावातों से अपने आपको बचाने वाला दीपक देवेन्द्र दीपक है। उन्हें आज भी कुछ गैरसामाजिक मान्यता प्राप्त असहमतियों का सामना भी करना पड़ता है, आज भी पड़ रहा है। आज मुझे भरत व्यास की वह पंक्ति याद आ रही है जिसमें वे कहते -निर्बल से लड़ाई बलवान की-और आगे के भाव को यथार्थ में बदलने वाले दीपक आज भी आलोकित हैं।

अभी तक मैंने उनके नाम के अर्थ पहचानने का प्रयत्न किया है, मैं अब उनके कामों की चर्चा करूंगा। वे जिस भारतीय संस्कारों से होते हुए इस अमृत-कलश तक की यात्रा सम्पन्न की है एक अनूठा और अनुकरणीय तो है ही साथ ही साथ इस बात का भी द्योतक है कि अपने आपको किस प्रकार निष्पक्ष रखाजाय। हम उन परभारतीयता के अतिरिक्त किसी प्रकार का भी लेबलनहीं लगा सकते। मानवीय संवेदनाएं उनका प्रथम चिन्तन है जिससे वे भी सहमत हूं। इसका परीक्षण करने के लिए उनके पास तक जाना होगा।  read more »

लाइलाज बीमारी लेखकों की

पूरन सरमा

शायद उस बहुचर्चित काण्ड से तो आप भी परिचित होंगे जब मेरी एक व्यंग्य रचना दो बार छप गई थी। मेरी ही असावधानी के कारण हुई थी वह दुर्घटना। लेखक समुदाय मुझसे पहले से कुण्ठित था, बस उन्हें तो गोल्डन चांस मिल गया। धड़ाधड़ दफ्तर में लोग मिलने आने लगे तथा टेलीफोन बजने लगे।

एक ऐसी अनहोनी जिसकी मुझे कल्पना भी नहीं थी, सनसनी की तरह शहर की फिजां में फैल गई। रचना छपी उस दिन तक भी मुझे पता नहीं था कि काण्ड इतना विकराल रूप ले लेगा। लेखकों ने संपादक को पत्र लिख-लिख कर पस्त कर दिया तथा मांग की जाने लगी कि मुझे ब्लैक लिस्ट किया जाए। कुण्ठित लेखकों का यह मानना था कि वे मुझे ब्लैक लिस्ट कराने के बाद वे अपनी रचना आसानी से छपा सकेंगे।  read more »

बगैर वर्दी के

सुप्रभ कुमार

वर्दी में है बहुत गुण सदा रखिए संग
वर्दी ना पहनी तो लला, तेरी लज्‍जा होगी भंग

यह ताजातरीन दोहा हमें एक पुराने मित्र ने फोन पर सुनाया फोन पर सुनाया। मित्र बोले - भैया, पहन लो वर्दी वरना लग जाएगी सर्दी। हमने पूछा - भैया । ये तुम्हें क्या हो गया जो आज वर्दी-वर्दी चिल्ला रहे हो। मित्र ने कहा - देखो भैया, वर्दी में हैं बहुत गुण। मसलन अपने पड़ोसी पाकिस्तान के राष्ट्रपति को ही लो। अगर वे एक दिन भी वर्दी उतार दें तो उन्हें दूसरे दिन ही देश छोड़ना पड़ जाए। सारा पाकिस्तान उनकी वर्दी से खौफ खाता है। सेना की वर्दी पहनने से सेना वाले भी उनके साथ हैं।  read more »

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